भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 256, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 256

कृष्णौ सम्मोहयन् मायां विदधे शकुनिस्ततः ॥ १५ ॥ अपने दोनों भाइयोंको मारा गया देख सैकड़ों मायाओंके प्रयोगमें निपुण शकुनिने श्रीकृष्ण और अर्जुनको मोहित करते हुए उनके प्रति मायाका प्रयोग किया ॥ १५ ॥ लगुडायोगुडाश्मानः शतघ्न्यश्च सशक्तयः । गदापरिघनिस्त्रिंशशूलमुद्गरपट्टिशाः ॥ १६ ॥ सकम्पनर्ष्टिनखरा मुसलानि परश्वधाः । क्षुराः क्षुरप्रनालीका वत्सदन्तास्थिसन्धयः ॥ १७ ॥ चक्राणि विशिखाः प्रासा विविधान्यायुधानि च । प्रपेतुः शतशो दिग्भ्यः प्रदिग्भ्यश्चार्जुनं प्रति ॥ १८ ॥ फिर तो अर्जुनके ऊपर डंडे, लोहेके गोले, पत्थर, शतघ्नी, शक्ति, गदा, परिघ, खड्ग, शूल, मुद्गर, पट्टिश, कम्पन, ऋष्टि, नखर, मुसल, फरसे, छूरे, क्षुरप्र, नालीक, वत्सदन्त, अस्थिसंधि, चक्र, बाण, प्रास तथा अन्य नाना प्रकारके सैकड़ों अस्त्र-शस्त्र सम्पूर्ण दिशाओं और विदिशाओंसे आ-आकर पड़ने लगे ॥ १६—१८ ॥ खरोष्ट्रमहिषाः सिंहा व्याघ्राः सृमरचित्रकाः । ऋक्षाः शालावृका गृध्राः कपयश्च सरीसृपाः ॥ १९ ॥ विविधानि च रक्षांसि क्षुधितान्यर्जुनं प्रति । संक्रुद्धान्यभ्यधावन्त विविधानि वयांसि च ॥ २० ॥ गदहे, ऊँट, भैंसे, सिंह, व्याघ्र, रोज़, चीते, रीक्ष, कुत्ते, गीध, बन्दर, साँप तथा नाना प्रकारके भूखे राक्षस एवं भाँति-भाँतिके पक्षी अत्यन्त कुपित हो अर्जुनपर धावा करने लगे ॥ १९-२० ॥ ततो दिव्यास्त्रविच्छूरः कुन्तीपुत्रो धनंजयः । विसृजन्निषुजालानि सहसा तान्यताडयत् ॥ २१ ॥ तदनन्तर दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता शूरवीर कुन्तीपुत्र धनंजय सहसा बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए उन सबको मारने लगे ॥ २१ ॥ ते हन्यमानाः शूरेण प्रवरैः सायकैर्दृढैः । विरुवन्तो महारावान् विनेशुः सर्वतो हताः ॥ २२ ॥ शूरवीर अर्जुनके सुदृढ़ एवं श्रेष्ठ सायकोंद्वारा मारे जाते हुए वे समस्त हिंसक पशु सब ओरसे घायल हो घोर चीत्कार करते हुए वहीं नष्ट हो गये ॥ २२ ॥ ततस्तमः प्रादुरभूदर्जुनस्य रथं प्रति । तस्माच्च तमसो वाचः क्रूराः पार्थमभर्त्सयन् ॥ २३ ॥ तदनन्तर अर्जुनके रथके समीप अन्धकार प्रकट हुआ और उस अंधकारसे क्रूरतापूर्ण बातें कानोंमें, पड़कर अर्जुनको डाँट बताने लगीं ॥ २३ ॥ तत् तमो भैरवं घोरं भयकर्तृ महाहवे ।

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