महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2603, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वाविंशोऽध्यायः
दुर्योधनका पराक्रम और उभयपक्षकी सेनाओंका घोर संग्राम
संजय उवाच
पुत्रस्तु ते महाराज रथस्थो रथिनां वरः ।
दुरुत्सहो बभौ युद्धे यथा रुद्रः प्रतापवान् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**महाराज! रथपर बैठा हुआ रथियोंमें श्रेष्ठ आपका प्रतापी पुत्र दुर्योधन रुद्रदेवके समान युद्धमें शत्रुओंके लिये दुःसह प्रतीत होने लगा ॥ १ ॥
तस्य बाणसहस्रैस्तु प्रच्छन्ना ह्यभवन्मही ।
परांश्च सिषिचे बाणैर्धाराभिरिव पर्वतान् ॥ २ ॥
उसके सहस्रों बाणोंसे वहाँकी सारी पृथ्वी आच्छादित हो गयी। जैसे मेघ जलकी धाराओंसे पर्वतको सींचते हैं, उसी प्रकार वह शत्रुओंको अपनी बाणधारासे नहलाने लगा ॥ २ ॥
न च सोऽस्ति पुमान् कश्चित् पाण्डवानां बलार्णवे ।
हयो गजो रथो वापि यः स्याद् बाणैरविक्षतः ॥ ३ ॥
पाण्डवोंके सैन्यसागरमें कोई भी ऐसा मनुष्य, घोड़ा, हाथी अथवा रथ नहीं था, जो दुर्योधनके बाणोंसे क्षत-विक्षत न हुआ हो ॥ ३ ॥
यं यं हि समरे योधं प्रपश्यामि विशाम्पते ।
स स बाणैश्चितोऽभूद् वै पुत्रेण तव भारत ॥ ४ ॥
प्रजानाथ! भरतनन्दन! मैं समरांगणमें जिस-जिस योद्धाको देखता था, वही-वही आपके पुत्रके बाणोंसे व्याप्त हुआ दिखायी देता था ॥ ४ ॥
यथा सैन्येन रजसा समुद्धूतेन वाहिनी ।
प्रत्यदृश्यत संछन्ना तथा बाणैर्महात्मनः ॥ ५ ॥
जैसे सैनिकोंद्वारा उड़ायी हुई धूलसे सारी सेना आच्छादित हो गयी थी, उसी प्रकार वह महामनस्वी दुर्योधनके बाणोंसे ढकी दिखायी देती थी ॥ ५ ॥
बाणभूतामपश्याम पृथिवीं पृथिवीपते ।
दुर्योधनेन प्रकृतां क्षिप्रहस्तेन धन्विना ॥ ६ ॥
पृथिवीपते! हमने देखा कि शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले धनुर्धर वीर दुर्योधनने सारी रणभूमिको बाणमयी कर दिया है ॥ ६ ॥
तेषु योधसहस्रेषु तावकेषु परेषु च ।