महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2754, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टात्रिंशोऽध्यायः
सप्तसारस्वततीर्थकी उत्पत्ति, महिमा और मंकणक मुनिका चरित्र
जनमेजय उवाच
सप्तसारस्वतं कस्मात् कश्च मङ्कणको मुनिः ।
कथंसिद्धः स भगवान् कश्चास्य नियमोऽभवत् ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**विप्रवर! सप्तसारस्वततीर्थकी उत्पत्ति किस हेतुसे हुई? पूजनीय मंकणक मुनि कौन थे? कैसे उन्हें सिद्धि प्राप्त हुई और उनका नियम क्या था? ॥ १ ॥
कस्य वंशे समुत्पन्नः किं चाधीतं द्विजोत्तम ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विधिवद् द्विजसत्तम ॥ २ ॥
द्विजश्रेष्ठ! वे किसके वंशमें उत्पन्न हुए थे और उन्होंने किस शास्त्रका अध्ययन किया था? यह सब मैं विधिपूर्वक सुनना चाहता हूँ ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
राजन् सप्त सरस्वत्यो याभिर्व्याप्तमिदं जगत् ।
आहूता बलवद्भिर्हि तत्र तत्र सरस्वती ॥ ३ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! सरस्वती नामकी सात नदियाँ और हैं, जो इस सारे जगत्में फैली हुई हैं। तपोबलसम्पन्न महात्माओंने जहाँ-जहाँ सरस्वतीका आवाहन किया है, वहाँ-वहाँ वे गयी हैं ॥ ३ ॥
सुप्रभा काञ्चनाक्षी च विशाला च मनोरमा ।
सरस्वती चौघवती सुरेणुर्विमलोदका ॥ ४ ॥
उन सबके नाम इस प्रकार हैं—सुप्रभा, कांचनाक्षी, विशाला, मनोरमा, सरस्वती, ओघवती, सुरेणु और विमलोदका ॥ ४ ॥
पितामहस्य महतो वर्तमाने महामखे ।
वितते यज्ञवाटे च संसिद्धेषु द्विजातिषु ॥ ५ ॥
पुण्याहघोषैर्विमलैर्वेदानां निनदैस्तथा ।
देवेषु चैव व्यग्रेषु तस्मिन् यज्ञविधौ तदा ॥ ६ ॥
एक समयकी बात है, पुष्करतीर्थमें महात्मा ब्रह्माजीका एक महान् यज्ञ हो रहा था। उनकी विस्तृत यज्ञशालामें सिद्ध ब्राह्मण विराजमान थे। पुण्याहवाचनके निर्दोष घोष तथा वेदमन्त्रोंकी ध्वनिसे सारा यज्ञमण्डप गूँज रहा था और सम्पूर्ण देवता उस यज्ञ-कर्मके सम्पादनमें व्यस्त थे ॥ ५-६ ॥