महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2755, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतत्र चैव महाराज दीक्षिते प्रपितामहे । यजतस्तस्य सत्रेण सर्वकामसमृद्धिना ॥ ७ ॥ महाराज! साक्षात् ब्रह्माजीने उस यज्ञकी दीक्षा ली थी। उनके यज्ञ करते समय सबकी समस्त इच्छाएँ उस यज्ञद्वारा परिपूर्ण होती थीं ॥ ७ ॥ मनसा चिन्तिता ह्यर्था धर्मार्थकुशलैस्तदा । उपतिष्ठन्ति राजेन्द्र द्विजातींस्तत्र तत्र ह ॥ ८ ॥ राजेन्द्र! धर्म और अर्थमें कुशल मनुष्य मनमें जिन पदार्थोंका चिन्तन करते थे, वे उनके पास वहाँ तत्काल उपस्थित हो जाते थे ॥ ८ ॥ जगुश्च तत्र गन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः । वादित्राणि च दिव्यानि वादयामासुरज्जसा ॥ ९ ॥ उस यज्ञमें गन्धर्व गीत गाते और अप्सराएँ नृत्य करती थीं। वहाँ दिव्य बाजे बजाये जा रहे थे ॥ ९ ॥ तस्य यज्ञस्य सम्पत्त्या तुतुषुर्देवता अपि । विस्मयं परमं जग्मुः किमु मानुषयोनयः ॥ १० ॥ उस यज्ञके वैभवसे देवता भी संतुष्ट थे और अत्यन्त आश्चर्यमें निमग्न हो रहे थे; फिर मनुष्योंकी तो बात ही क्या है? ॥ १० ॥ वर्तमाने तथा यज्ञे पुष्करस्थे पितामहे । अब्रुवन्नृषयो राजन्नायं यज्ञो महागुणः ॥ ११ ॥ न दृश्यते सरिच्छ्रेष्ठा यस्मादिह सरस्वती । राजन्! इस प्रकार जब पितामह ब्रह्मा पुष्करमें रहकर यज्ञ कर रहे थे, उस समय ऋषियोंने उनसे कहा—‘भगवन्! आपका यह यज्ञ अभी महान् गुणसे सम्पन्न नहीं है; क्योंकि यहाँ सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती नहीं दिखायी देती हैं’ ॥ ११ १/२ ॥ तच्छ्रुत्वा भगवान् प्रीतः सस्मराथ सरस्वतीम् ॥ १२ ॥ पितामहेन यजता आहूता पुष्करेषु वै । यह सुनकर भगवान् ब्रह्माने प्रसन्नतापूर्वक सरस्वती देवीकी आराधना करके पुष्करमें यज्ञ करते समय उनका आवाहन किया ॥ १२ १/२ ॥ सुप्रभा नाम राजेन्द्र नाम्ना तत्र सरस्वती ॥ १३ ॥ तां दृष्ट्वा मुनयस्तुष्टास्त्वरायुक्तां सरस्वतीम् । पितामहं मानयन्तीं क्रतुं ते बहु मेनिरे ॥ १४ ॥ राजेन्द्र! तब वहाँ सरस्वती सुप्रभा नामसे प्रकट हुईं। बड़ी उतावलीके साथ आकर ब्रह्माजीका सम्मान करती हुई सरस्वतीका दर्शन करके ऋषिगण बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने उस यज्ञको बहुत सम्मान दिया ॥ एवमेषा सरिच्छ्रेष्ठा पुष्करेषु सरस्वती ।