भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2756

पितामहार्थं सम्भूता तुष्ट्यर्थं च मनीषिणाम् ॥ १५ ॥ इस प्रकार सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती पुष्करतीर्थमें ब्रह्माजी तथा मनीषी महात्माओंके संतोषके लिये प्रकट हुईं ॥ १५ ॥ नैमिषे मुनयो राजन् समागम्य समासते । तत्र चित्राः कथा ह्यासन् वेदं प्रति जनेश्वर ॥ १६ ॥ राजन्! जनेश्वर! नैमिषारण्यमें बहुत-से मुनि आकर रहते थे। वहाँ वेदके विषयमें विचित्र कथा-वार्ता होती रहती थी ॥ १६ ॥ यत्र ते मुनयो ह्यासन् नानास्वाध्यायवेदिनः । ते समागम्य मुनयः सस्मरुर्वै सरस्वतीम् ॥ १७ ॥ जहाँ वे नाना प्रकारके स्वाध्यायोंका ज्ञान रखनेवाले मुनि रहते थे, वहीं उन्होंने परस्पर मिलकर सरस्वती देवीका स्मरण किया ॥ १७ ॥ सा तु ध्याता महाराज ऋषिभिः सत्रयाजिभिः । समागतानां राजेन्द्र साहाय्यार्थं महात्मनाम् ॥ १८ ॥ आजगाम महाभागा तत्र पुण्या सरस्वती । महाराज! राजाधिराज! उन सत्रयाजी (ज्ञानयज्ञ करनेवाले) ऋषियोंके ध्यान लगानेपर महाभागा पुण्यसलिला सरस्वतीदेवी उन समागत महात्माओंकी सहायताके लिये वहाँ आयीं ॥ १८३ ॥ नैमिषे काञ्चनाक्षी तु मुनीनां सत्रयाजिनाम् ॥ १९ ॥ आगता सरितां श्रेष्ठा तत्र भारत पूजिता । भारत! नैमिषारण्यतीर्थमें उन सत्रयाजी मुनियोंके समक्ष आयी हुई सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती कांचनाक्षी नामसे सम्मानित हुईं ॥ १९½ ॥ गयस्य यजमानस्य गयेष्वेव महाक्रतुम् ॥ २० ॥ आहूता सरितां श्रेष्ठा गययज्ञे सरस्वती । विशालां तु गयस्याहुर्ऋषयः संशितव्रताः ॥ २१ ॥ राजा गय गयदेशमें ही एक महान् यज्ञका अनुष्ठान कर रहे थे। उनके यज्ञमें भी सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीका आवाहन किया गया था। कठोर व्रतका पालन करनेवाले महर्षि गयके यज्ञमें आयी हुई सरस्वतीको विशाला कहते हैं ॥ २०-२१ ॥ सरित् सा हिमवत्पार्श्वात् प्रसुता शीघ्रगामिनी । औद्दालकेस्तथा यज्ञे यजतस्तस्य भारत ॥ २२ ॥ भरतनन्दन! यज्ञपरायण उद्दालक ऋषिके यज्ञमें भी सरस्वतीका आवाहन किया गया। वे शीघ्रगामिनी सरस्वती हिमालयसे निकलकर उस यज्ञमें आयी थीं ॥ समेते सर्वतः स्फीते मुनीनां मण्डले तदा । उत्तरे कोसलाभागे पुण्ये राजन् महात्मना ॥ २३ ॥