भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2757, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2757

उद्दालकेन यजता पूर्वं ध्याता सरस्वती । आजगाम सरिच्छ्रेष्ठा तं देशं मुनिकारणात् ॥ २४ ॥ राजन्! उन दिनों समृद्धिशाली एवं पुण्यमय उत्तर कोसल प्रान्तमें सब ओरसे मुनिमण्डली एकत्र हुई थी। उसमें यज्ञ करते हुए महात्मा उद्दालकने पूर्वकालमें सरस्वती देवीका ध्यान किया। तब मुनिका कार्य सिद्ध करनेके लिये सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती उस देशमें आयीं ॥ २३-२४ ॥

पूज्यमाना मुनिगणैर्वल्कलाजिनसंवृतैः । मनोरमेति विख्याता सा हि तैर्मनसा कृता ॥ २५ ॥ वहाँ वल्कल और मृगचर्मधारी मुनियोंसे पूजित होनेवाली सरस्वतीका नाम हुआ मनोरमा; क्योंकि उन्होंने मनके द्वारा उनका चिन्तन किया था ॥ २५ ॥

सुरेणुर्ऋषभे द्वीपे पुण्ये राजर्षिसेविते । कुरोश्च यजमानस्य कुरुक्षेत्रे महात्मनः ॥ २६ ॥ आजगाम महाभागा सरिच्छ्रेष्ठा सरस्वती । राजर्षियोंसे सेवित पुण्यमय ऋषभद्वीप तथा कुरुक्षेत्रमें जब महात्मा राजा कुरु यज्ञ कर रहे थे, उस समय सरिताओंमें श्रेष्ठ महाभागा सरस्वती वहाँ आयी थीं; उनका नाम हुआ सुरेणु ॥ २६ १/२ ॥

ओघवत्यपि राजेन्द्र वसिष्ठेन महात्मना ॥ २७ ॥ समाहूता कुरुक्षेत्रे दिव्यतोया सरस्वती । दक्षेण यजता चापि गङ्गाद्वारे सरस्वती ॥ २८ ॥ सुरेणुरिति विख्याता प्रसुता शीघ्रगामिनी । गङ्गाद्वारमें यज्ञ करते समय दक्षप्रजापतिने जब सरस्वतीका स्मरण किया था, उस समय भी शीघ्रगामिनी सरस्वती वहाँ बहती हुई सुरेणु नामसे ही विख्यात हुईं। राजेन्द्र! इसी प्रकार महात्मा वसिष्ठने भी कुरुक्षेत्रमें दिव्यसलिला सरस्वतीका आवाहन किया था, जो ओघवतीके नामसे प्रसिद्ध हुईं ॥ २७-२८ १/२ ॥

विमलोदा भगवती ब्रह्मणा यजता पुनः ॥ २९ ॥ समाहूता ययौ तत्र पुण्ये हैमवते गिरौ । ब्रह्माजीने एक बार फिर पुण्यमय हिमालयपर्वतपर यज्ञ किया था। उस समय उनके आवाहन करनेपर भगवती सरस्वतीने विमलोदका नामसे प्रसिद्ध होकर वहाँ पदार्पण किया था ॥ २९ १/२ ॥

एकीभूतास्ततस्तास्तु तस्मिंस्तीर्थे समागताः ॥ ३० ॥ सप्तसारस्वतं तीर्थं ततस्तु प्रथितं भुवि । फिर ये सातों सरस्वतियाँ एकत्र होकर उस तीर्थमें आयी थीं, इसीलिये इस भूतलपर 'सप्तसारस्वततीर्थके नामसे उसकी प्रसिद्धि हुई' ॥ ३० १/२ ॥