महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2758, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंइति सप्तसरस्वत्यो नामतः परिकीर्तिताः ॥ ३१ ॥
सप्तसारस्वतं चैव तीर्थं पुण्यं तथा स्मृतम् ।
इस प्रकार सात सरस्वती नदियोंका नामोल्लेखपूर्वक वर्णन किया गया है। इन्हींसे सप्तसारस्वत नामक परम पुण्यमय तीर्थका प्रादुर्भाव बताया गया है ।। ३१ १/२ ।।
शृणु मङ्कणकस्यापि कौमारब्रह्मचारिणः ।। ३२ ।।
आपगामवगाढस्य राजन् प्रक्रीडितं महत् ।
राजन्! कुमारावस्थासे ही ब्रह्मचर्यव्रतका पालन तथा प्रतिदिन सरस्वती नदीमें स्नान करनेवाले मंकणक मुनिका महान् लीलामय चरित्र सुनो ।। ३२ १/२ ।।
दृष्ट्वा यदृच्छया तत्र स्त्रियमंभासि भारत ॥ ३३ ॥
जयन्तीं रुचिरापाङ्गीं दिग्वाससमनिन्दिताम् ।
सरस्वत्यां महाराज चस्कन्दे वीर्यमम्भसि ॥ ३४ ॥
भरतनन्दन! महाराज! एक समयकी बात है, कोई सुन्दर नेत्रोंवाली अनिन्द्य सुन्दरी रमणी सरस्वतीके जलमें नहा रही थी। दैवयोगसे मंकणक मुनिकी दृष्टि उसपर पड़ गयी और उनका वीर्य स्खलित होकर जलमें गिर पड़ा ।। ३३-३४ ।।
तद् रेतः स तु जग्राह कलशे वै महातपाः ।
सप्तधा प्रविभागं तु कलशस्थं जगाम ह ॥ ३५ ॥
महातपस्वी मुनिने उस वीर्यको एक कलशमें ले लिया। कलशमें स्थित होनेपर वह वीर्य सात भागोंमें विभक्त हो गया ।। ३५ ।।
तत्रर्षयः सप्त जाता जज्ञिरे मरुतां गणाः ।
वायुवेगो वायुबलो वायुहा वायुमण्डलः ॥ ३६ ॥
वायुज्वालो वायुरेता वायुचक्रश्च वीर्यवान् ।
एवमेते समुत्पन्ना मरुतां जनयिष्णवः ॥ ३७ ॥
उस कलशमें सात ऋषि उत्पन्न हुए, जो मूलभूत मरुद्गण थे। उनके नाम इस प्रकार हैं—वायुवेग, वायुबल, वायुहा, वायुमण्डल, वायुज्वाल, वायुरेता और शक्तिशाली वायुचक्र। ये उनचास मरुद्गणोंके जन्मदाता 'मरुत्' उत्पन्न हुए थे* ।। ३६-३७ ।।
इदमत्यद्भुतं राजन् शृण्वाश्चर्यतरं भुवि ।
महर्षेश्चरितं याद्दक् त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ ३८ ॥
राजन्! महर्षि मंकणकका यह तीनों लोकोंमें विख्यात अद्भुत चरित्र जैसा सुना गया है, इसे तुम भी श्रवण करो। वह अत्यन्त आश्चर्यजनक है ।। ३८ ।।
पुरा मङ्कणकः सिद्धः कुशाग्रेणेति नः श्रुतम् ।
क्षतः किल करे राजंस्तस्य शाकरसोऽस्रवत् ॥ ३९ ॥