महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2859, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रलोभनार्थं तस्याथ प्राहिणोत् पाकशासनः । दिव्यामप्सरसं पुण्यां दर्शनीयामलम्बुषाम् ॥ ७ ॥ तब इन्द्रने मुनिको लुभानेके लिये एक पवित्र दर्शनीय एवं दिव्य अप्सरा भेजी, जिसका नाम था अलम्बुषा ॥ ७ ॥ तस्य तर्पयतो देवान् सरस्वत्यां महात्मनः । समीपतो महाराज सोपातिष्ठत भाविनी ॥ ८ ॥ महाराज! एक दिन, जब महात्मा दधीच सरस्वती नदीमें देवताओंका तर्पण कर रहे थे, वह माननीय अप्सरा उनके पास जाकर खड़ी हो गयी ॥ ८ ॥ तां दिव्यवपुषं दृष्ट्वा तस्यर्षेर्भावितात्मनः । रेतः स्कन्नं सरस्वत्यां तत् सा जग्राह निम्नगा ॥ ९ ॥ उस दिव्यरूपधारिणी अप्सराको देखकर उन विशुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षिका वीर्य सरस्वतीके जलमें गिर पड़ा। उस वीर्यको सरस्वती नदीने स्वयं ग्रहण कर लिया ॥ ९ ॥ कुक्षौ चाप्यदधाद् हृष्टा तद् रेतः पुरुषर्षभ । सा दधार च तं गर्भं पुत्रहेतोर्महानदी ॥ १० ॥ पुरुषप्रवर! उस महानदीने हर्षमें भरकर पुत्रके लिये उस वीर्यको अपनी कुक्षिमें रख लिया और इस प्रकार वह गर्भवती हो गयी ॥ १० ॥ सुषुवे चापि समये पुत्रं सा सरितां वरा । जगाम पुत्रमादाय तमृषिं प्रति च प्रभो ॥ ११ ॥ प्रभो! समय आनेपर सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीने एक पुत्रको जन्म दिया और उसे लेकर वह ऋषिके पास गयी ॥ ११ ॥ ऋषिसंसदि तं दृष्ट्वा सा नदी मुनिसत्तमम् । ततः प्रोवाच राजेन्द्र ददती पुत्रमस्य तम् ॥ १२ ॥ राजेन्द्र! ऋषियोंकी सभामें बैठे हुए मुनिश्रेष्ठ दधीचको देखकर उन्हें उनका वह पुत्र सौंपती हुई सरस्वती नदी इस प्रकार बोली— ॥ १२ ॥ ब्रह्मर्षे तव पुत्रोऽयं त्वद्भक्त्या धारितो मया । दृष्ट्वा तेऽप्सरसं रेतो यत् स्कन्नं प्रागलम्बुषाम् ॥ १३ ॥ तत् कुक्षिणा वै ब्रह्मर्षे त्वद्भक्त्या धृतवत्यहम् । न विनाशमिदं गच्छेत् त्वत्तेज इति निश्चयात् ॥ १४ ॥ प्रतिगृहीष्व पुत्रं स्वं मया दत्तमनिन्दितम् ।