भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2863

न गन्तव्यमितः पुत्र तवाहारमहं सदा ॥ ३९ ॥ दास्यामि मत्स्यप्रवरानुष्यतामिह भारत। भरतनन्दन! सरस्वती इस प्रकार बोलीं—‘बेटा! तुम्हें यहाँसे कहीं नहीं जाना चाहिये। मैं सदा तुम्हें भोजनके लिये उत्तमोत्तम मछलियाँ दूँगी; अतः तुम यहीं रहो’॥

इत्युक्तस्तर्पयामास स पितॄन् देवतास्तथा ॥ ४० ॥ आहारमकरोन्नित्यं प्राणान् वेदांश्च धारयन्। सरस्वतीके ऐसा कहनेपर सारस्वत मुनि वहीं रहकर देवताओं और पितरोंको तृप्त करने लगे। वे प्रतिदिन भोजन करते और अपने प्राणों तथा वेदोंकी रक्षा करते थे॥ ४० १/२ ॥

अथ तस्यामनावृष्ट्यामतीतायां महर्षयः ॥ ४१ ॥ अन्योन्यं परिपप्रच्छुः पुनः स्वाध्यायकारणात्। जब बारह वर्षोंकी वह अनावृष्टि प्रायः बीत गयी, तब महर्षि पुनः स्वाध्यायके लिये एक-दूसरेसे पूछने लगे॥ ४१ १/२ ॥

तेषां क्षुधापरीतानां नष्टा वेदाभिधावताम् ॥ ४२ ॥ सर्वेषामेव राजेन्द्र न कश्चित् प्रतिभानवान्। राजेन्द्र! उस समय भूखसे पीड़ित होकर इधर-उधर दौड़नेवाले सभी महर्षि वेद भूल गये थे। कोई भी ऐसा प्रतिभाशाली नहीं था, जिसे वेदोंका स्मरण रह गया हो॥ ४२ १/२ ॥

अथ कश्चिदृषिस्तेषां सारस्वतमुपेयिवान् ॥ ४३ ॥ कुर्वाणं संशितात्मानं स्वाध्यायमृषिसत्तमम्। तदनन्तर उनमेंसे कोई ऋषि प्रतिदिन स्वाध्याय करनेवाले शुद्धात्मा मुनिवर सारस्वतके पास आये॥

स गत्वाऽऽचष्ट तेभ्यश्च सारस्वतमतिप्रभम् ॥ ४४ ॥ स्वाध्यायममरप्रख्यं कुर्वाणं विजने वने। फिर वहाँसे जाकर उन्होंने सब महर्षियोंको बताया कि ‘देवताओंके समान अत्यन्त कान्तिमान् एक सारस्वत मुनि हैं, जो निर्जन वनमें रहकर सदा स्वाध्याय करते हैं’॥

ततः सर्वे समाजग्मुस्तत्र राजन् महर्षयः ॥ ४५ ॥ सारस्वतं मुनिश्रेष्ठमिदमूचुः समागताः। अस्मानध्यापयस्वेति तानुवाच ततो मुनिः ॥ ४६ ॥ शिष्यत्वमुपगच्छध्वं विधिवद्द्वि ममेत्युत। राजन्! यह सुनकर वे सब महर्षि वहाँ आये और आकर मुनिश्रेष्ठ सारस्वतसे इस प्रकार बोले—‘मुने! आप हम लोगोंको वेद पढ़ाइये।’ तब सारस्वतने उनसे कहा—‘आपलोग विधिपूर्वक मेरी शिष्यता ग्रहण करें’॥

तत्राब्रुवन् मुनिगणा बालस्त्वमसि पुत्रक ॥ ४७ ॥