भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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चतुःषष्टितमोऽध्यायः

दुर्योधनका संजयके सम्मुख विलाप और वाहकोंद्वारा

अपने साथियोंको संदेश भेजना

धृतराष्ट्र उवाच

अधिष्ठितः पदा मूर्ध्नि भग्नसक्थो महीं गतः ।

शौटीर्यमानी पुत्रो मे किमभाषत संजय ।। १ ।।

अत्यर्थं कोपनो राजा जातवैरश्च पाण्डुषु ।

व्यसनं परमं प्राप्तः किमाह परमाहवे ।। २ ।।

धृतराष्ट्रने पूछा—संजय! जब जाँघें टूट जानेके कारण मेरा पुत्र पृथ्वीपर गिर पड़ा

और भीमसेनने उसके मस्तकपर पैर रख दिया, तब उसने क्या कहा? उसे अपने बलपर

बड़ा अभिमान था। राजा दुर्योधन अत्यन्त क्रोधी तथा पाण्डवोंसे वैर रखनेवाला था। उस

युद्धभूमिमें जब वह बड़ी भारी विपत्तिमें फँस गया, तब क्या बोला? ।। १-२ ।।

संजय उवाच

शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि यथावृत्तं नराधिप ।

राज्ञा यदुक्तं भग्नेन तस्मिन् व्यसन आगते ।। ३ ।।

संजयने कहा—राजन्! सुनिये। नरेश्वर! उस भारी संकटमें पड़ जानेपर टूटी जाँघवाले

राजा दुर्योधनने जो कुछ कहा था, वह सब वृत्तान्त यथार्थरूपसे बता रहा हूँ ।।

भग्नसक्थो नृपो राजन् पांसुना सोऽवगुण्ठितः ।

यमयन् मूर्धजांस्तत्र वीक्ष्य चैव दिशो दश ।। ४ ।।

केशान् नियम्य यत्नेन निःश्वसन्नुरगो यथा ।

संरम्भाश्रुपरीताभ्यां नेत्राभ्यामभिवीक्ष्य माम् ।। ५ ।।

बाहू धरण्यां निष्पिष्य सुदुर्मत्त इव द्विपः ।

प्रकीर्णान् मूर्धजान् धुन्वन् दन्तैर्दन्तानुपस्पृशन् ।। ६ ।।

गर्हयन् पाण्डवं ज्येष्ठं निःश्वस्येदमथाब्रवीत् ।

राजन्! जब कौरव-नरेशकी जाँघें टूट गयीं तब वह धरतीपर गिरकर धूलमें सन गया।

फिर बिखरे हुए बालोंको समेटता हुआ वहाँ दसों दिशाओंकी ओर देखने लगा। बड़े

प्रयत्नसे अपने बालोंको बाँधकर सर्पके समान फुफकारते हुए उसने रोष और आँसुओंसे

भरे हुए नेत्रोंद्वारा मेरी ओर देखा। इसके बाद दोनों भुजाओंको पृथ्वीपर रगड़कर मदोन्मत्त

गजराजके समान अपने बिखरे केशोंको हिलाता, दाँतोंसे दाँतोंको पीसता तथा ज्येष्ठ

पाण्डव युधिष्ठिरकी निन्दा करता हुआ वह उच्छ्वास ले इस प्रकार बोला— ।। ४—६½ ।।