महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2977, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंअपश्यन्त वनं घोरं नानाद्रुमलतावृतम् ॥ १७ ॥ **संजयने कहा—**राजन्! आपके पक्षके वे तीनों वीर वहाँसे थोड़ी ही दूरपर जाकर खड़े हो गये। वहाँ उन्होंने नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे भरा हुआ एक भयंकर वन देखा ॥ १७ ॥
ते मुहूर्तं तु विश्रम्य लब्धतोयैर्हयोत्तमैः । सूर्यास्तमनवेलायां समासेदुर्महद् वनम् ॥ १८ ॥ नानामृगगणैर्जुष्टं नानापक्षिगणावृतम् । नानाद्रुमलताच्छन्नं नानाव्यालनिषेवितम् ॥ १९ ॥ उस स्थानपर थोड़ी देरतक ठहरकर उन सब लोगोंने अपने उत्तम घोड़ोंको पानी पिलाया और सूर्यास्त होते-होते वे उस विशाल वनमें जा पहुँचे, जहाँ अनेक प्रकारके मृग और भाँति-भाँतिके पक्षी निवास करते थे, तरह-तरहके वृक्षों और लताओंने उस वनको व्याप्त कर रखा था और अनेक जातिके सर्प उसका सेवन करते थे ॥ १८-१९ ॥
नानातोयैः समाकीर्णं नानापुष्पोपशोभितम् । पद्मिनीशतसंछन्नं नीलोत्पलसमायुतम् ॥ २० ॥ उसमें जहाँ-तहाँ अनेक प्रकारके जलाशय थे, भाँति-भाँतिके पुष्प उस वनकी शोभा बढ़ा रहे थे, शत-शत रक्तकमल और असंख्य नीलकमल वहाँके जलाशयोंमें सब ओर छा रहे थे ॥ २० ॥
प्रविश्य तद् वनं घोरं वीक्षमाणाः समन्ततः । शाखासहस्रसंछन्नं न्यग्रोधं ददृशुस्ततः ॥ २१ ॥ उस भयंकर वनमें प्रवेश करके सब ओर दृष्टि डालनेपर उन्हें सहस्रों शाखाओंसे आच्छादित एक बरगदका वृक्ष दिखायी दिया ॥ २१ ॥
उपेत्य तु तदा राजन् न्यग्रोधं ते महारथाः । ददृशुर्द्विपदां श्रेष्ठाः श्रेष्ठं तं वै वनस्पतिम् ॥ २२ ॥ राजन्! मनुष्योंमें श्रेष्ठ उन महारथियोंने पास जाकर उस उत्तम वनस्पति (बरगद)-को देखा ॥ २२ ॥
तेऽवतीर्य रथेभ्यश्च विप्रमुच्य च वाजिनः । उपस्पृश्य यथान्यायं संध्यामन्वासत प्रभो ॥ २३ ॥ प्रभो! वहाँ रथोंसे उतरकर उन तीनोंने अपने घोड़ोंको खोल दिया और यथोचितरूपसे स्नान आदि करके संध्योपासना की ॥ २३ ॥
ततोऽस्तं पर्वतश्रेष्ठमनुप्राप्ते दिवाकरे । सर्वस्य जगतो धात्री शर्वरी समपद्यत ॥ २४ ॥ तदनन्तर सूर्यदेवके पर्वतश्रेष्ठ अस्ताचलपर पहुँच जानेपर धायकी भाँति सम्पूर्ण जगत्को अपनी गोदमें विश्राम देनेवाली रात्रिदेवीका सर्वत्र आधिपत्य हो गया ॥ २४ ॥