भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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चतुर्थोऽध्यायः

कृपाचार्यका कल प्रातःकाल युद्ध करनेकी सलाह देना और अश्वत्थामाका इसी रात्रिमें सोते हुओंको मारनेका आग्रह प्रकट करना

कृप उवाच

दिष्ट्या ते प्रतिकर्तव्ये मतिर्जातेयमच्युत ।
न त्वां वारयितुं शक्तो वज्रपाणिरपि स्वयम् ।। १ ।।
**कृपाचार्य बोले—**तात! तुम अपनी टेकसे टलने-वाले नहीं हो, सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारे मनमें बदला लेनेका दृढ़ विचार उत्पन्न हुआ। तुम्हें साक्षात् वज्रधारी इन्द्र भी इस कार्यसे रोक नहीं सकते ।। १ ।।

अनुयास्यावहे त्वां तु प्रभाते सहितावुभौ ।
अद्य रात्रौ विश्रमस्व विमुक्तकवचध्वजः ।। २ ।।
आज रातमें कवच और ध्वजा खोलकर विश्राम करो। कल सबेरे हम दोनों एक साथ होकर तुम्हारे पीछे-पीछे चलेंगे ।। २ ।।

अहं त्वामनुयास्यामि कृतवर्मा च सात्वतः ।
परानभिमुखं यान्तं रथावास्थाय दंशितौ ।। ३ ।।
जब तुम शत्रुओंका सामना करनेके लिये आगे बढ़ोगे, उस समय मैं और सात्वतवंशी कृतवर्मा दोनों ही कवच धारण करके रथोंपर आरूढ़ हो तुम्हारे साथ चलेंगे ।। ३ ।।

आवाभ्यां सहितः शत्रून् श्वो निहन्ता समागमे ।
विक्रम्य रथिनां श्रेष्ठ पञ्चालान् सपदानुगान् ।। ४ ।।
रथियोंमें श्रेष्ठ वीर! कल सबेरेके संग्राममें हम दोनोंके साथ रहकर तुम अपने शत्रु पांचालों और उनके सेवकोंको बलपूर्वक मार डालना ।। ४ ।।

शक्तस्त्वमसि विक्रम्य विश्रमस्व निशामिमाम् ।
चिरं ते जाग्रतस्तात स्वप तावन्निशामिमाम् ।। ५ ।।
तात! तुम पराक्रम दिखाकर शत्रुओंका वध करनेमें समर्थ हो, अतः इस रातमें विश्राम कर लो। तुम्हें जागते हुए बहुत देर हो गयी है, अब इस रातमें सो लो ।। ५ ।।

विश्रान्तश्च विनिद्रश्च स्वस्थचित्तश्च मानद ।
समेत्य समरे शत्रून् वधिष्यसि न संशयः ।। ६ ।।
मानद! थकावट दूर करके नींद पूरी कर लेनेसे तुम्हारा चित्त स्वस्थ हो जायगा। फिर तुम समरभूमिमें जाकर शत्रुओंका वध कर सकोगे, इसमें संशय नहीं है ।। ६ ।।