भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 3004

यस्तेषां तदवस्थानां द्रुह्येत पुरुषोऽनृजुः । व्यक्तं स नरके मज्जेदगाधे विपुलेऽप्लवे ॥ १४ ॥ प्रभो! आज रातमें समस्त पांचाल कवच उतारकर निश्चिन्त हो मुर्दोंके समान अचेत सो रहे होंगे। उस अवस्थामें जो क्रूर मनुष्य उनके साथ द्रोह करेगा, वह निश्चय ही नौकारहित अगाध एवं विशाल नरकके समुद्रमें डूब जायगा ॥ १३-१४ ॥ सर्वास्त्रविदुषां लोके श्रेष्ठस्त्वमसि विश्रुतः । न च ते जातु लोकेऽस्मिन् सुसूक्ष्ममपि किल्बिषम् ॥ १५ ॥ संसारके सम्पूर्ण अस्त्रवेत्ताओंमें तुम श्रेष्ठ हो। तुम्हारी सर्वत्र ख्याति है। इस जगत्में अबतक कभी तुम्हारा छोटे-से-छोटा दोष भी देखनेमें नहीं आया है ॥ त्वं पुनः सूर्यसंकाशः श्वोभूत उदिते रवौ । प्रकाशे सर्वभूतानां विजेता युधि शात्रवान् ॥ १६ ॥ कल सबेरे सूर्योदय होनेपर तुम सूर्यके समान प्रकाशित हो उजालेमें युद्ध छेड़कर समस्त प्राणियोंके सामने पुनः शत्रुओंपर विजय प्राप्त करना ॥ १६ ॥ असम्भावितरूपं हि त्वयि कर्म विगर्हितम् । शुक्ले रक्तमिव न्यस्तं भवेदिति मतिर्मम ॥ १७ ॥ जैसे सफेद वस्त्रमें लाल रंगका धब्बा लग जाय, उस प्रकार तुममें निन्दित कर्मका होना सम्भावनासे परेकी बात है, ऐसा मेरा विश्वास है ॥ १७ ॥

अश्वत्थामोवाच

एवमेव यथाऽऽत्थ त्वं मातुलेह न संशयः । तैस्तु पूर्वमयं सेतुः शतधा विदलीकृतः ॥ १८ ॥ अश्वत्थामा बोला—मामाजी! आप जैसा कहते हैं, निःसंदेह वही ठीक है; परंतु पाण्डवोंने ही पहले इस धर्म-मर्यादाके सैकड़ों टुकड़े कर डाले हैं ॥ १८ ॥ प्रत्यक्षं भूमिपालानां भवतां चापि संनिधौ । न्यस्तशस्त्रो मम पिता धृष्टद्युम्नेन पातितः ॥ १९ ॥ धृष्टद्युम्नने समस्त राजाओंके सामने और आपलोगोंके निकट ही मेरे उस पिताको मार गिराया, जिन्होंने अस्त्र-शस्त्र रख दिये थे ॥ १९ ॥ कर्णश्च पतिते चक्रे रथस्य रथिनां वरः । उत्तमे व्यसने मग्नो हतो गाण्डीवधन्वना ॥ २० ॥ रथियोंमें श्रेष्ठ कर्णको भी गाण्डीवधारी अर्जुनने उस अवस्थामें मारा था, जब कि उनके रथका पहिया गड्ढेमें गिरकर फँस गया था और इसीलिये वे भारी संकटमें पड़े हुए थे ॥ २० ॥ तथा शान्तनवो भीष्मो न्यस्तशस्त्रो निरायुधः ।