भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 3003, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 3003

परंतु जिसे सन्मार्गपर नहीं ले जाया जा सकता, जो दूसरोंकी अवहेलना करनेवाला है तथा जिसका अन्तःकरण दूषित है, यह पापात्मा पुरुष बताये हुए कल्याणकारी पथको छोड़कर बहुत-से पापकर्म करने लगता है ॥ ६ ॥

नाथवन्तं तु सुहृदः प्रतिषेधन्ति पातकात् ।
निवर्तते तु लक्ष्मीवान् नालक्ष्मीवान् निवर्तते ॥ ७ ॥
जो सनाथ है, उसे उसके हितैषी सुहृद् पापकर्मोंसे रोकते हैं, जो भाग्यवान् है—जिसके भाग्यमें सुख भोगना बदा है, वह मना करनेपर उस पापकर्मसे रुक जाता है; परंतु जो भाग्यहीन है, वह उस दुष्कर्मसे नहीं निवृत्त होता है ॥ ७ ॥

यथा ह्युच्चावचैर्वाक्यैः क्षिप्तचित्तो नियम्यते ।
तथैव सुहृदा शक्यो न शक्यस्त्ववसीदति ॥ ८ ॥
जैसे मनुष्य विक्षिप्त चित्तवाले पागलको नाना प्रकारके ऊँच-नीच वचनोंद्वारा समझा-बुझाकर या डरा-धमकाकर काबूमें लाते हैं, उसी प्रकार सुहृद्गण भी अपने स्वजनको समझा-बुझाकर और डाँट-डपटकर वशमें रखनेकी चेष्टा करते हैं। जो वशमें आ जाता है, वह तो सुखी होता है और जो किसी तरह काबूमें नहीं आ सकता, वह दुःख भोगता है ॥ ८ ॥

तथैव सुहृदं प्राज्ञं कुर्वाणं कर्म पापकम् ।
प्राज्ञाः सम्प्रतिषेधन्ति यथाशक्ति पुनः पुनः ॥ ९ ॥
इसी तरह विद्वान् पुरुष पापकर्ममें प्रवृत्त होनेवाले अपने बुद्धिमान् सुहृद्को भी यथाशक्ति बारंबार मना करते हैं ॥ ९ ॥

स कल्याणे मनः कृत्वा नियम्यात्मानमात्मना ।
कुरु मे वचनं तात येन पश्चान्न तप्स्यसे ॥ १० ॥
तात! तुम भी स्वयं ही अपने मनको काबूमें करके उसे कल्याणसाधनमें लगाकर मेरी बात मानो, जिससे तुम्हें पश्चात्ताप न करना पड़े ॥ १० ॥

न वधः पूज्यते लोके सुप्तानामिह धर्मतः ।
तथैवापास्तशस्त्राणां विमुक्तरथवाजिनाम् ॥ ११ ॥
ये च ब्रूयुस्तवास्मीति ये च स्युः शरणागताः ।
विमुक्तमूर्धजा ये च ये चापि हतवाहनाः ॥ १२ ॥
जो सोये हुए हों, जिन्होंने अस्त्र-शस्त्र रख दिये हों, रथ और घोड़े खोल दिये हों, 'जो मैं आपका ही हूँ' ऐसा कह रहे हों, जो शरणमें आ गये हों, जिनके बाल खुले हुए हों तथा जिनके वाहन नष्ट हो गये हों, इस लोकमें ऐसे लोगोंका वध करना धर्मकी दृष्टिसे अच्छा नहीं समझा जाता ॥ ११-१२ ॥

अद्य स्वप्स्यन्ति पञ्चाला विमुक्तकवचा विभो ।
विश्वस्ता रजनीं सर्वे प्रेता इव विचेतसः ॥ १३ ॥

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