महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 3002, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्यायः
अश्वत्थामा और कृपाचार्यका संवाद तथा तीनोंका पाण्डवोंके शिविरकी ओर प्रस्थान
कृप उवाच
शुश्रूषुरपि दुर्मेधाः पुरुषोऽनियतेन्द्रियः ।
नालं वेदयितुं कृत्स्नौ धर्मार्थाविति मे मतिः ॥ १ ॥
**कृपाचार्य बोले—**अश्वत्थामन्! मेरा विचार है कि जिस मनुष्यकी बुद्धि दुर्भावनासे युक्त है तथा जिसने अपनी इन्द्रियोंको काबूमें नहीं रखा है, वह धर्म और अर्थकी बातोंको सुननेकी इच्छा रखनेपर भी उन्हें पूर्णरूपसे समझ नहीं सकता ॥ १ ॥
तथैव तावन्मेधावी विनयं यो न शिक्षते ।
न च किंचन जानाति सोऽपि धर्मार्थनिश्चयम् ॥ २ ॥
इसी प्रकार मेधावी होनेपर भी जो मनुष्य विनय नहीं सीखता, वह भी धर्म और अर्थके निर्णयको थोड़ा भी नहीं समझ पाता है ॥ २ ॥
चिरं ह्यपि जडः शूरः पण्डितं पर्युपास्य हि ।
न स धर्मान् विजानाति दर्वी सूपरसानिव ॥ ३ ॥
जिसकी बुद्धिपर जडता छा रही हो, वह शूरवीर योद्धा दीर्घकालतक विद्वान्की सेवामें रहनेपर भी धर्मोंका रहस्य नहीं जान पाता। ठीक उसी तरह जैसे करछुल दालमें डूबी रहनेपर भी उसके स्वादको नहीं जानती है ॥ ३ ॥
मुहूर्तमपि तं प्राज्ञः पण्डितं पर्युपास्य हि ।
क्षिप्रं धर्मान् विजानाति जिह्वा सूपरसानिव ॥ ४ ॥
जैसे जिह्वा दालके स्वादको जानती है, उसी प्रकार बुद्धिमान् पुरुष यदि दो घड़ी भी विवेकशीलकी सेवामें रहे तो वह शीघ्र ही धर्मोंका रहस्य जान लेता है ॥ ४ ॥
शुश्रूषुस्त्वेव मेधावी पुरुषो नियतेन्द्रियः ।
जानीयादागमान् सर्वान् ग्राह्यं च न विरोधयेत् ॥ ५ ॥
अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाला मेधावी पुरुष यदि विद्वानोंकी सेवामें रहे और उनसे कुछ सुननेकी इच्छा रखे तो वह सम्पूर्ण शास्त्रोंको समझ लेता है तथा ग्रहण करनेयोग्य वस्तुका विरोध नहीं करता ॥ ५ ॥
अनेयस्त्ववमानी यो दुरात्मा पापपूरुषः ।
दिष्टमुत्सृज्य कल्याणं करोति बहुपापकम् ॥ ६ ॥