भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 3001

यश्चायं मित्रपक्षो मे मयि जीवति निर्जितः ।। २९ ।। शोकं मे वर्धयत्येष वारिवेग इवार्णवम्। एकाग्रमनसो मेऽद्य कुतो निद्रा कुतः सुखम् ।। ३० ।। ‘मेरे जीते-जी जो यह मेरा मित्र-पक्ष परास्त हो गया, वह मेरे शोककी उसी प्रकार वृद्धि कर रहा है, जैसे जलका वेग समुद्रको बढ़ा देता है। आज मेरा मन एक ही कार्यकी ओर लगा हुआ है, फिर मुझे नींद कैसे आ सकती है और मुझे सुख भी कैसे मिल सकता है? ।।

वासुदेवार्जुनाभ्यां च तानहं परिरक्षितान् । अविषह्यतमान् मन्ये महेन्द्रेणापि सत्तम् ।। ३१ ।। ‘सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ मामाजी! पाण्डव और पांचाल जब श्रीकृष्ण और अर्जुनसे सुरक्षित हों, उस दशामें मैं उन्हें देवराज इन्द्रके लिये भी अत्यन्त असह्य एवं अजेय मानता हूँ ।।

न चापि शक्तः संयन्तुं कोपमेतं समुत्थितम् । तं न पश्यामि लोकेऽस्मिन् यो मां कोपान्निवर्तयेत् ।। ३२ ।। ‘इस समय जो क्रोध उत्पन्न हुआ है, इसे मैं स्वयं भी रोक नहीं सकता। इस संसारमें किसी भी ऐसे पुरुषको नहीं देख रहा हूँ, जो मुझे क्रोधसे दूर हटा दे ।।

तथैव निश्चिता बुद्धिरेषा साधु मता मम । वार्तिकैः कथ्यमानस्तु मित्राणां मे पराभवः ।। ३३ ।। पाण्डवानां च विजयो हृदयं दहतीव मे । ‘इसी प्रकार मैंने जो अपनी बुद्धिमें शत्रुओंके संहारका यह दृढ़ निश्चय कर लिया है, यही मुझे अच्छा प्रतीत होता है। जब संदेशवाहक दूत मेरे मित्रोंकी पराजय और पाण्डवोंकी विजयका समाचार कहने लगते हैं, तब वह मेरे हृदयको दग्ध-सा कर देता है ।।

अहं तु कदनं कृत्वा शत्रूणामद्य सौप्तिके । ततो विश्रमिता चैव स्वप्ता च विगतज्वरः ।। ३४ ।। ‘मैं तो आज सोते समय शत्रुओंका संहार करके निश्चिन्त होनेपर ही विश्राम करूँगा और नींद लूँगा' ।।

इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि द्रौणिमन्त्रणायां चतुर्थोऽध्यायः ।। ४ ।। इस प्रकार महाभारत सौप्तिकपर्वमें अश्वत्थामाकी मन्त्रणाविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ ।। ४ ।।

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