महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहाराज! उन दोनों महारथियोंको अपना साथ देनेके लिये प्रयत्नशील देख अश्वत्थामाको बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने उनसे धीरेसे इस प्रकार कहा— ।। ६ ।।
यत्तौ भवन्तौ पर्याप्तौ सर्वक्षत्रस्य नाशने ।
किं पुर्नयोधशेषस्य प्रसुप्तस्य विशेषतः ।। ७ ।।
‘यदि आप दोनों सावधान होकर चेष्टा करें तो सम्पूर्ण क्षत्रियोंका विनाश करनेके लिये पर्याप्त हैं। फिर इन बचे-खुचे और विशेषतः सोये हुए योद्धाओंको मारना कौन बड़ी बात है? ।। ७ ।।
अहं प्रवेक्ष्ये शिविरं चरिष्यामि च कालवत् ।
यथा न कश्चिदपि वा जीवन् मुच्येत मानवः ।। ८ ।।
तथा भवद्भ्यां कार्यं स्यादिति मे निश्चिता मतिः ।
‘मैं तो इस शिविरके भीतर घुस जाऊँगा और वहाँ कालके समान विचरूँगा। आपलोग ऐसा करें जिससे कोई भी मनुष्य आप दोनोंके हाथसे जीवित न बच सके, यही मेरा दृढ़ विचार है’ ।। ८ १/२ ।।
इत्युक्त्वा प्राविशद् द्रौणिः पार्थानां शिविरं महत् ।। ९ ।।
अद्वारेणाभ्यवस्कन्द्य विहाय भयमात्मनः ।
ऐसा कहकर द्रोणकुमार पाण्डवोंके विशाल शिविरमें बिना दरवाजेके ही कूदकर घुस गया। उसने अपने जीवनका भय छोड़ दिया था ।। ९ १/२ ।।
स प्रविश्य महाबाहुरुद्देशज्ञश्च तस्य ह ।। १० ।।
धृष्टद्युम्नस्य निलयं शनकैरभ्युपागमत् ।
वह महाबाहु वीर शिविरके प्रत्येक स्थानसे परिचित था, अतः धीरे-धीरे धृष्टद्युम्नके खेमेमें जा पहुँचा ।।
ते तु कृत्वा महत् कर्म श्रान्ताश्च बलवद् रणे ।। ११ ।।
प्रसुप्ताश्चैव विश्वस्ताः स्वसैन्यपरिवारिताः ।
वहाँ वे पांचाल वीर रणभूमिमें महान् पराक्रम करके बहुत थक गये थे और अपने सैनिकोंसे घिरे हुए निश्चिन्त सो रहे थे ।। ११ १/२ ।।
अथ प्रविश्य तद् वेश्म धृष्टद्युम्नस्य भारत ।। १२ ।।
पाञ्चाल्यं शयने द्रौणिरपश्यत् सुप्तमन्तिकात् ।
क्षौमावदाते महति स्पर्ध्यास्तरणसंवृते ।। १३ ।।
माल्यप्रवरसंयुक्ते धूपैश्चूर्णैश्च वासिते ।
भरतनन्दन! धृष्टद्युम्नके उस डेरेमें प्रवेश करके द्रोणकुमारने देखा कि पांचालराजकुमार पास ही बहुमूल्य बिछौनोंसे युक्त तथा रेशमी चादरसे ढकी हुई एक विशाल शय्यापर सो रहा है। वह शय्या श्रेष्ठ मालाओंसे सुसज्जित तथा धूप एवं चन्दन चूर्णसे सुवासित थी ।। १२-१३ १/२ ।।