भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

श्रीमहाभारतम्

द्रोणपर्व

द्रोणाभिषेकपर्व

प्रथमोऽध्यायः

भीष्मजीके धराशायी होनेसे कौरवोंका शोक तथा उनके द्वारा कर्णका स्मरण

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्य सखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उन लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत)-का पाठ करना चाहिये।

जनमेजय उवाच
तमप्रतिमसत्त्वौजबलवीर्यसमन्वितम् ।
हतं देवव्रतं श्रुत्वा पाञ्चाल्येन शिखण्डिना ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रस्ततो राजा शोकव्याकुललोचनः ।
किमचेष्टत विप्रर्षे हते पितरि वीर्यवान् ॥ २ ॥
जनमेजयने पूछा— ब्रह्मन्! अनुपम सत्त्व, ओज, बल और पराक्रमसे सम्पन्न देवव्रत भीष्मको पांचालराज शिखण्डीके हाथसे मारा गया सुनकर राजा धृतराष्ट्रके नेत्र शोकसे व्याकुल हो उठे होंगे। ब्रह्मर्षे! अपने ज्येष्ठ पिताके मारे जानेपर पराक्रमी धृतराष्ट्रने कैसी चेष्टा की? ॥ १-२ ॥
तस्य पुत्रो हि भगवन् भीष्मद्रोणमुखै रथैः ।
पराजित्य महेष्वासान् पाण्डवान् राज्यमिच्छति ॥ ३ ॥
भगवन्! उनका पुत्र दुर्योधन भीष्म, द्रोण आदि महारथियोंके द्वारा महाधनुर्धर पाण्डवोंको पराजित करके स्वयं राज्य हथिया लेना चाहता था ॥ ३ ॥