महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 411, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
राजा पौरवके अद्भुत दानका वृत्तान्त
नारद उवाच
राजानं पौरवं वीरं मृतं सृञ्जय शुश्रुम ।
सहस्रं यः सहस्राणां श्वेतानश्वानवासृजत् ॥ १ ॥
**नारदजी कहते हैं—**संजय! हमने वीर राजा पौरवकी भी मृत्यु हुई सुनी है, जिन्होंने दस लाख श्वेत घोड़ोंका दान किया था ॥ १ ॥
तस्याश्वमेधे राजर्षेर्देशाद्देशात् समीयुषाम् ।
शिक्षाक्षरविधिज्ञानां नासीत् संख्या विपश्चिताम् ॥ २ ॥
उन राजर्षिके अश्वमेध-यज्ञमें देश-देशसे आये हुए शिक्षाशास्त्र, अक्षर (विभिन्न देशोंकी लिपि) और यज्ञविधिके ज्ञाता विद्वानोंकी गिनती नहीं थी ॥ २ ॥
वेदविद्याव्रतस्नाता वदान्याः प्रियदर्शनाः ।
सुभिक्षाच्छादनगृहाः सुशय्यासनभोजनाः ॥ ३ ॥
वेदविद्याके अध्ययनका व्रत पूर्ण करके स्नातक बने हुए उदार और प्रियदर्शन पण्डितजन राजासे उत्तम अन्न, वस्त्र, गृह, सुन्दर शय्या, आसन और भोजन पाते थे ॥ ३ ॥
नटनर्तकगन्धर्वैः पूर्णकैर्वर्धमानकैः ।
नित्योद्योगैश्च क्रीडद्भिस्तत्र स्म परिहर्षिताः ॥ ४ ॥
नित्य उद्योगशील एवं खेल-कूद करनेवाले नट, नर्तक और गन्धर्वगण कुक्कुटकी-सी आकृतिवाले आरतीके प्यालोंसे अपनी कला दिखाकर उक्त विद्वानोंका मनोरंजन एवं हर्षवर्द्धन करते रहते थे ॥ ४ ॥
यज्ञे यज्ञे यथाकालं दक्षिणाः सोऽत्यकालयत् ।
द्विपा दशसहस्राख्याः प्रमदाः काञ्चनप्रभाः ॥ ५ ॥
सध्वजाः सपताकाश्च रथा हेममयास्तथा ।
यः सहस्रं सहस्राणि कन्या हेमविभूषिताः ॥ ६ ॥
राजा पौरव प्रत्येक यज्ञमें यथासमय प्रचुर दक्षिणा बाँटते थे। उन्होंने स्वर्णकी-सी कान्तिवाले दस हजार मतवाले हाथी, ध्वजा और पताकाओंसहित सुवर्णमय बहुत-से रथ तथा एक लाख स्वर्णभूषित कन्याओंका दान किया था ॥ ५-६ ॥
धुर्य्युजाश्वगजारूढाः सगृहक्षेत्रगोशताः ।
शतं शतसहस्राणि स्वर्णमालिमहात्मनाम् ॥ ७ ॥
गवां सहस्रानुचरान् दक्षिणामत्यकालयत् ।