भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 514

गये ।। २० ।। यज्वनां दानशीलानां ब्राह्मणानां कृतात्मनाम् । चरितब्रह्मचर्याणां पुण्यतीर्थावगाहिनाम् ।। २१ ।। कृतज्ञानां वदान्यानां गुरुशुश्रूषिणामपि । सहस्रदक्षिणानां च या गतिस्तामवाप्नुहि ।। २२ ।। 'वत्स! यज्ञकर्ता, दानी, जितेन्द्रिय, ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण, ब्रह्मचारी, पुण्यतीर्थोंमें नहानेवाले, कृतज्ञ, उदार, गुरुसेवा-परायण और सहस्रोंकी संख्यामें दक्षिणा देनेवाले धर्मात्मा पुरुषोंको जो गति प्राप्त होती है, वही तुम्हें भी मिले ।। या गतिर्युध्यमानानां शूराणामनिवर्तिनाम् । हत्वारीन् निहतानां च संग्रामे तां गतिं व्रज ।। २३ ।। 'संग्राममें युद्धतत्पर हो कभी पीछे पैर न हटानेवाले और शत्रुओंको मारकर मरनेवाले शूरवीरोंको जो गति प्राप्त होती है, वही तुम्हें भी मिले ।। २३ ।। गोसहस्रप्रदातॄणां क्रतुदानां च या गतिः । नैवेशिकं चाभिमतं ददतां या गतिः शुभा ।। २४ ।। 'सहस्र गोदान करनेवाले, यज्ञके लिये दान देनेवाले तथा मनके अनुरूप सब सामग्रियोंसहित निवासस्थान प्रदान करनेवाले पुरुषोंको जो शुभ गति प्राप्त होती है, वही तुम्हें भी मिले ।। २४ ।। ब्राह्मणेभ्यः शरण्येभ्यो निधिं निदधतां च या । या चापि न्यस्तदण्डानां तां गतिं व्रज पुत्रक ।। २५ ।। 'जो शरणागतवत्सल ब्राह्मणोंके लिये निधि स्थापित करते हैं तथा किसी भी प्राणीको दण्ड नहीं देते, उन्हें जिस गतिकी प्राप्ति होती है, बेटा! वही गति तुम्हें भी प्राप्त हो ।। २५ ।। ब्रह्मचर्येण यां यान्ति मुनयः संशितव्रताः । एकपत्न्यश्च यां यान्ति तां गतिं व्रज पुत्रक ।। २६ ।। 'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनि ब्रह्मचर्यके द्वारा जिस गतिको पाते हैं और पतिव्रता स्त्रियोंको जिस गतिकी प्राप्ति होती है, बेटा! वही गति तुम्हें भी सुलभ हो ।। २६ ।। राज्ञां सुचरितैर्या च गतिर्भवति शाश्वती । चतुराश्रमिणां पुण्यैः पावितानां सुरक्षितैः ।। २७ ।। दीनानुकम्पिनां या च सततं संविभागिनाम् । पैशुन्याच्च निवृत्तानां तां गतिं व्रज पुत्रक ।। २८ ।। 'पुत्र! सदाचारके पालनसे राजाओंको तथा सुरक्षित पुण्यके प्रभावसे पवित्र हुए चारों आश्रमोंके लोगोंको जो सनातन गति प्राप्त होती है; दीनोंपर दया करनेवाले, उत्तम