महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 577, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसीदन्ति स्म नरा राजन् शङ्खशब्देन मारिष ।
विसंज्ञाश्चाभवन् केचित् केचिद् राजन् वितत्रसुः ॥ २५ ॥
आदरणीय महाराज! अपनी सेनाके सब मनुष्य वह शंखनाद सुनकर शिथिल हो गये। नरेश्वर! कितने ही तो मूर्च्छित हो गये और कितने ही भयसे थर्रा उठे ॥
ततः कपिर्महानादं सह भूतैर्ध्वजालयैः ।
अकरोद् व्यादितास्यश्च भीषयंस्तव सैनिकान् ॥ २६ ॥
तत्पश्चात् अर्जुनकी ध्वजामें निवास करनेवाले भूतगणोंके साथ वहाँ बैठे हुए हनुमान्जीने मुँह बाकर आपके सैनिकोंको भयभीत करते हुए बड़े जोरसे गर्जना की ॥
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च मृदङ्गाश्चानकैः सह ।
पुनरेवाभ्यहन्यन्त तव सैन्यप्रहर्षणाः ॥ २७ ॥
तब आपकी सेनामें भी पुनः मृदंग और ढोलके साथ शंख तथा नगाड़े बज उठे, जो आपके सैनिकोंके हर्ष और उत्साहको बढ़ानेवाले थे ॥ २७ ॥
नानावादित्रसंह्नादैः क्ष्वेडितास्फोटिताकुलैः ।
सिंहनादैः समुत्कृष्टैः समाधूतैर्महारथैः ॥ २८ ॥
तस्मिंस्तु तुमुले शब्दे भीरूणां भयवर्धने ।
अतीव हृष्टो दाशार्हमब्रवीत् पाकशासनिः ॥ २९ ॥
नाना प्रकारके रणवाद्योंकी ध्वनिसे, गर्जन-तर्जन करनेसे, ताल ठोंकनेसे, सिंहनादसे और महारथियोंके ललकारनेसे जो शब्द होते थे, वे सब मिलकर भयंकर हो उठे और भीरु पुरुषोंके हृदयमें भय उत्पन्न करने लगे। उस समय अत्यन्त हर्षमें भरे हुए इन्द्रपुत्र अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा ॥ २८-२९ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि अर्जुनरणप्रवेशे
अष्टाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें अर्जुनका रणभूमिमें प्रवेशविषयक अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८८ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३० श्लोक हैं।)