महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 576, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ कृष्णोऽप्यसम्भ्रान्तः पार्थेन सह मारिष । प्राध्मापयत् पाञ्चजन्यं शङ्खं प्रवरमोजसा ॥ २१ ॥ आर्य! तब श्रीकृष्णने भी अर्जुनके साथ बिना किसी घबराहटके अपने श्रेष्ठ शंख पांचजन्यको बलपूर्वक बजाया ॥ २१ ॥ तयोः शङ्खप्रणादेन तव सैन्ये विशाम्पते । आसन् संहृष्टरोमाणः कम्पिता गतचेतसः ॥ २२ ॥ प्रजानाथ! उन दोनोंके शंखनादसे आपकी सेनाके समस्त योद्धाओंके रोंगटे खड़े हो गये, सब लोग काँपते हुए अचेत-से हो गये ॥ २२ ॥ यथा त्रस्यन्ति भूतानि सर्वाण्यशनिनिःस्वनात् । तथा शङ्खप्रणादेन वित्रेसुस्तव सैनिकाः ॥ २३ ॥ जैसे वज्रकी गड़गड़ाहटसे सारे प्राणी थर्रा उठते हैं, उसी प्रकार उन दोनों वीरोंकी शंखध्वनिसे आपके समस्त सैनिक संत्रस्त हो उठे ॥ २३ ॥ प्रसुस्रुवुः शकृन्मूत्रं वाहनानि च सर्वशः । एवं सवाहनं सर्वमाविग्नमभवद् बलम् ॥ २४ ॥ सेनाके सभी वाहन भयके मारे मल-मूत्र करने लगे। इस प्रकार सवारियोंसहित सारी सेना उद्विग्न हो गयी ॥