भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 575

राजन्! महाराज! ऐसा कहता हुआ वह महामनस्वी महाबुद्धिमान् एवं महाधनुर्धर दुर्मर्षण बड़े-बड़े धनुर्धरोंसे घिरकर युद्धके लिये खड़ा हो गया ॥ १४ ॥

ततोऽन्तक इव क्रुद्धः सवज्र इव वासवः । दण्डपाणिरिवासह्यो मृत्युः कालेन चोदितः ॥ १५ ॥ शूलपाणिरिवाक्षोभ्यो वरुणः पाशवानिव । युगान्ताग्निरिवार्चिष्मान् प्रधक्ष्यन् वै पुनः प्रजाः ॥ १६ ॥ क्रोधामर्षबलोद्धूतो निवातकवचान्तकः । जयो जेता स्थितः सत्ये पारयिष्यन् महाव्रतम् ॥ १७ ॥ आमुक्तकवचः खड्गी जाम्बूनदकिरीटभृत् । शुभ्रमाल्याम्बरधरः स्वङ्गदश्चारुकुण्डलः ॥ १८ ॥ रथप्रवरमास्थाय नरो नारायणानुगः । विधुन्वन् गाण्डिवं संख्ये बभौ सूर्य इवोदितः ॥ १९ ॥

तत्पश्चात् क्रोधमें भरे हुए यमराज, वज्रधारी इन्द्र, दण्डधारी असह्य अन्तक, कालप्रेरक मृत्यु, किसीसे भी क्षुब्ध न होनेवाले त्रिशूलधारी रुद्र, पाशधारी वरुण तथा पुनः समस्त प्रजाको दग्ध करनेके लिये उठे हुए ज्वालाओंसे युक्त प्रलयकालीन अग्निदेवके समान दुर्धर्ष वीर अर्जुन युद्धस्थलमें अपने श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो गाण्डीव धनुषकी टंकार करते हुए नवोदित सूर्यके समान प्रकाशित होने लगे। वे क्रोध, अमर्ष और बलसे प्रेरित होकर आगे बढ़ रहे थे। उन्होंने ही पूर्वकालमें निवातकवच नामक दानवोंका संहार किया था। वे जय नामके अनुसार ही विजयी होते थे। सत्यमें स्थित होकर अपने महान् व्रतको पूर्ण करनेके लिये उद्यत थे। उन्होंने कवच बाँध रखा था। मस्तकपर जाम्बूनद सुवर्णका बना हुआ किरीट धारण किया था। उनके कमरमें तलवार लटक रही थी। वे नरस्वरूप अर्जुन नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णका अनुसरण करते हुए सुन्दर अंगदों (बाजूबन्द) और मनोहर कुण्डलोंसे सुशोभित हो रहे थे। उन्होंने श्वेत माला और श्वेत वस्त्र पहन रखे थे ॥ १५—१९ ॥

सोऽग्रानीकस्य महत इषुपाते धनंजयः । व्यवस्थाप्य रथं राजन् शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ॥ २० ॥

राजन्! प्रतापी अर्जुनने अपने सामने खड़ी हुई विशाल शत्रुसेनाके सम्मुख, जितनी दूरसे बाण मारा जा सके उतनी ही दूरीपर अपने रथको खड़ा करके शंख बजाया ॥ २० ॥