महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 574, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंचचाल च मही कृत्स्ना भये घोरे समुत्थिते ॥ ६ ॥ महान् भय उपस्थित होनेके कारण आकाशसे भयंकर गर्जनाके साथ सहस्रों जलती हुई उल्काएँ गिरने लगीं और सारी पृथ्वी काँपने लगी ॥ ६ ॥
विष्वग्वाताः सनिर्घाता रूक्षाः शर्करवर्षिणः । ववुर्रायाति कौन्तेये संग्रामे समुपस्थिते ॥ ७ ॥ अर्जुनके आने और संग्रामका अवसर उपस्थित होनेपर रेतकी वर्षा करनेवाली विकट गर्जन-तर्जनके साथ रूखी एवं चौवाई हवा चलने लगी ॥ ७ ॥
नाकुलिश्च शतानीको धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः । पाण्डवानामनीकानि प्राज्ञौ तौ व्यूहतुस्तदा ॥ ८ ॥ उस समय नकुलपुत्र शतानीक और द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न—इन दोनों बुद्धिमान् वीरोंने पाण्डव सैनिकोंके व्यूहका निर्माण किया ॥ ८ ॥
ततो रथसहस्रेण द्विरदानां शतेन च । त्रिभिश्चश्वसहस्रैश्च पदातीनां शतैः शतैः ॥ ९ ॥ अध्यर्धमात्रे धनुषां सहस्रे तनयस्तव । अग्रतः सर्वसैन्यानां स्थित्वा दुर्मर्षणोऽब्रवीत् ॥ १० ॥ तदनन्तर एक हजार रथी, सौ हाथीसवार, तीन हजार घुड़सवार और दस हजार पैदल सैनिकोंके साथ आकर अर्जुनसे डेढ़ हजार धनुषकी दूरीपर स्थित हो समस्त कौरव सैनिकोंके आगे होकर आपके पुत्र दुर्मर्षणने इस प्रकार कहा— ॥ ९-१० ॥
अद्य गाण्डीवधन्वानं तपन्तं युद्धदुर्मदम् । अहमावारयिष्यामि वेलेव मकरालयम् ॥ ११ ॥ 'जिस प्रकार तटभूमि समुद्रको आगे बढ़नेसे रोकती है, उसी प्रकार आज मैं युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले शत्रु-संतापी गाण्डीवधारी अर्जुनको रोक दूँगा ॥ ११ ॥
अद्य पश्यन्तु संग्रामे धनंजयममर्षणम् । विषक्तं मयि दुर्धर्षमश्मकूटमिवाश्मनि ॥ १२ ॥ 'आज सब लोग देखें, जैसे पत्थर दूसरे प्रस्तरसमूहसे टकराकर रह जाता है, उसी प्रकार अमर्षशील दुर्धर्ष अर्जुन युद्धस्थलमें मुझसे भिड़कर अवरुद्ध हो जायँगे ॥ १२ ॥
तिष्ठध्वं रथिनो यूयं संग्राममभिकाङ्क्षिणः । युध्यामि संहतानेतान् यशो मानं च वर्धयन् ॥ १३ ॥ 'संग्रामकी इच्छा रखनेवाले रथियो! आपलोग चुपचाप खड़े रहें। मैं कौरवकुलके यश और मानकी वृद्धि करता हुआ आज इन संगठित होकर आये हुए शत्रुओंके साथ युद्ध करूँगा' ॥ १३ ॥
एवं ब्रुवन्महाराज महात्मा स महामतिः । महेष्वासैर्वृतो राजन् महेष्वासो व्यवस्थितः ॥ १४ ॥