भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 595

अन्वयातां महात्मानौ विशन्तं तावकं बलम् ॥ ३६ ॥

आपकी सेनामें प्रवेश करते समय उनके पीछे-पीछे पांचाल वीर महामना युधामन्यु

और उत्तमौजा चक्र-रक्षक होकर गये ॥ ३६ ॥

ततो जयो महाराज कृतवर्मा च सात्वतः ।

काम्बोजश्च श्रुतायुश्च धनंजयमवारयन् ॥ ३७ ॥

महाराज! तब जय, सात्वतवंशी कृतवर्मा, काम्बोज-नरेश तथा श्रुतायुने सामने आकर

अर्जुनको रोका ॥ ३७ ॥

तेषां दश सहस्राणि रथानामनुयायिनाम् ।

अभीषाहाः शूरसेनाः शिबयोऽथ वसातयः ॥ ३८ ॥

मावेल्लका ललित्थाश्च केकया मद्रकास्तथा ।

नारायणाश्च गोपालाः काम्बोजानां च ये गणाः ॥ ३९ ॥

कर्णेन विजिताः पूर्वं संग्रामे शूरसम्मताः ।

भारद्वाजं पुरस्कृत्य हृष्टात्मानोऽर्जुनं प्रति ॥ ४० ॥

इनके पीछे दस हजार रथी, अभीषाह, शूरसेन, शिबि, वसाति, मावेल्लक, ललित्थ,

केकय, मद्रक, नारायण नामक गोपालगण तथा काम्बोजदेशीय सैनिकगण भी थे। इन

सबको पूर्वकालमें कर्णने रणभूमिमें जीतकर अपने अधीन कर लिया था। ये सब-के-सब

शूरवीरोंद्वारा सम्मानित योद्धा थे और प्रसन्नचित्त हो द्रोणाचार्यको आगे करके अर्जुनपर चढ़

आये थे ॥ ३८-४० ॥

पुत्रशोकाभिसंतप्तं क्रुद्धं मृत्युमिवान्तकम् ।

त्यजन्तं तुमुले प्राणान् संनद्धं चित्रयोधिनम् ॥ ४१ ॥

गाहमानमनीकानि मातङ्गमिव यूथपम् ।

महेष्वासं पराक्रान्तं नरव्याघ्रमवारयन् ॥ ४२ ॥

अर्जुन पुत्रशोकसे संतप्त एवं कुपित हुए प्राणान्तक मृत्युके समान प्रतीत होते थे। वे

उस भयंकर युद्धमें अपने प्राणोंको निछावर करनेके लिये उद्यत, कवच आदिसे सुसज्जित

और विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले थे। जैसे यूथपति गजराज गजसमूहमें प्रवेश करता है,

उसी प्रकार आपकी सेनाओंमें घुसते हुए महाधनुर्धर परम पराक्रमी उन नरश्रेष्ठ अर्जुनको

पूर्वोक्त योद्धाओंने आकर रोका ॥ ४१-४२ ॥

ततः प्रवृत्ते युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् ।

अन्योन्यं वै प्रार्थयतां योधानामर्जुनस्य च ॥ ४३ ॥

तदनन्तर एक-दूसरेको ललकारते हुए कौरव-योद्धाओं तथा अर्जुनमें रोमांचकारी एवं

भयंकर युद्ध छिड़ गया ॥ ४३ ॥

जयद्रथवधप्रेप्सुमायान्तं पुरुषर्षभम् ।

न्यवारयन्त सहिताः क्रिया व्याधिमिवोत्थितम् ॥ ४४ ॥