भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 704, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 704

स्वस्ति द्रोणाय सहसा सर्वभूतान्यथाब्रुवन् ।। ३१ ।। युद्धस्थलमें धर्मराजके द्वारा उठायी हुई उस शक्तिको देखकर समस्त प्राणी सहसा बोल उठे—‘द्रोणाय स्वस्ति (द्रोणाचार्यका कल्याण हो)’ ।। ३१ ।। सा राजभुजनिर्मुक्ता निर्मुक्तोरगसंनिभा । प्रज्वालयन्ती गगनं दिशः सप्रदिशस्तथा ।। ३२ ।। द्रोणान्तिकमनुप्राप्ता दीप्तास्या पन्नगी यथा । केंचुलसे छूटे हुए सर्पके समान राजाकी भुजाओंसे मुक्त हुई वह शक्ति आकाश, दिशाओं तथा विदिशाओं (कोणों)-को प्रकाशित करती हुई जलते मुखवाली नागिनके समान द्रोणाचार्यके निकट जा पहुँची ।। ३२ १/२ ।। तामापतन्तीं सहसा दृष्ट्वा द्रोणो विशाम्पते ।। ३३ ।। प्रादुश्चक्रे ततो ब्राह्ममस्त्रमस्त्रविदां वरः । प्रजानाथ! तब सहसा आती हुई उस शक्तिको देखकर अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ द्रोणने ब्रह्मास्त्र प्रकट किया ।। ३३ १/२ ।। तदस्त्रं भस्मसात्कृत्वा तां शक्तिं घोरदर्शनाम् ।। ३४ ।। जगाम स्यन्दनं तूर्ण पाण्डवस्य यशस्विनः । वह अस्त्र भयंकर दीखनेवाली उस शक्तिको भस्म करके तुरंत ही यशस्वी युधिष्ठिरके रथकी ओर चला ।। ३४ १/२ ।। ततो युधिष्ठिरो राजा द्रोणास्त्रं तत् समुद्यतम् ।। ३५ ।। अशामयन्महाप्राज्ञो ब्रह्मास्त्रेणैव मारिष । माननीय नरेश! तब महाप्राज्ञ राजा युधिष्ठिरने द्रोणद्वारा चलाये गये उस ब्रह्मास्त्रको ब्रह्मास्त्रद्वारा ही शान्त कर दिया ।। ३५ १/२ ।। विद्ध्वा तं च रणे द्रोणं पञ्चभिर्नतपर्वभिः ।। ३६ ।। क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन चिच्छेदास्य महत् धनुः । इसके बाद झुकी हुई गाँठवाले पाँच बाणोंद्वारा रणक्षेत्रमें द्रोणाचार्यको घायल करके तीखे क्षुरप्रसे उनके विशाल धनुषको काट दिया ।। ३६ १/२ ।। तदपास्य धनुश्छिन्नं द्रोणः क्षत्रियमर्दनः ।। ३७ ।। गदां चिक्षेप सहसा धर्मपुत्राय मारिष । आर्य! क्षत्रियमर्दन द्रोणने उस कटे हुए धनुषको फेंककर सहसा धर्मपुत्र युधिष्ठिरपर गदा चलायी ।। तामापतन्तीं सहसा गदां दृष्ट्वा युधिष्ठिरः ।। ३८ ।। गदामेवाग्रहीत् क्रुद्धश्चिक्षेप च परंतप ।

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