महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 887, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन सबको संग्राममें पराजित करके महाबली पाण्डुपुत्र भीमसेनने अपनी भुजाओंपर ताल ठोकी और सिंहके समान गर्जना की॥ ७२ १/२ ॥
तलशब्दं च सुमहत् कृत्वा भीमो महाबलः ॥ ७३ ॥
भीषयित्वा रथानीकं हत्वा योधान् वरान् वरान् ।
व्यतीत्य रथिनश्चापि द्रोणानीकमुपाद्रवत् ॥ ७४ ॥
बड़े जोरसे ताली बजाकर महाबली भीमने रथसेनाको डरा दिया और श्रेष्ठ-श्रेष्ठ योद्धाओंको चुन-चुनकर मारा। फिर समस्त रथियोंको लाँघकर द्रोणाचार्यकी सेनापर धावा बोल दिया॥ ७३-७४॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि भीमसेनप्रवेशे भीमपराक्रमे सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें भीमसेनका प्रवेश और भयंकर पराक्रमविषयक एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२७॥
* अनलो गौर्हिरण्यं च दूर्वागोरोचनामृतम् । अक्षतं दधि चेत्यष्टौ मङ्गलानि प्रचक्षते ॥
अग्नि, गौ, सुवर्ण, दूर्वा, गोरोचन, अमृत (घी), अक्षत और दही—इन आठ वस्तुओंको मांगलिक कहते हैं।