भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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नवमोऽध्यायः

द्रोणाचार्यकी मृत्युका समाचार सुनकर धृतराष्ट्रका शोक करना

धृतराष्ट्र उवाच

किं कुर्वाणं रणे द्रोणं जघ्नुः पाण्डवसृंजयाः ।
तथा निपुणमस्त्रेषु सर्वशस्त्रभृतामपि ॥ १ ॥

**धृतराष्ट्र बोले—**संजय! रणक्षेत्रमें द्रोणाचार्य क्या कर रहे थे कि पाण्डव तथा सृंजय उनपर चोट कर सके? वे तो सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ और अस्त्र-विद्यामें निपुण थे ॥ १ ॥

रथभङ्गो बभूवास्य धनुर्वाशीर्यतास्यतः ।
प्रमत्तो वाभवद् द्रोणस्ततो मृत्युमुपेयिवान् ॥ २ ॥

उनका रथ टूट गया था या बाणोंका प्रहार करते समय धनुष ही खण्डित हो गया था अथवा द्रोणाचार्य असावधान थे, जिससे उनकी मृत्यु हो गयी? ॥ २ ॥

कथं नु पार्षतस्तात शत्रुभिर्दुष्प्रधर्षणम् ।
किरन्तमिषुसंघातान् रुक्मपुङ्खाननेकणः ॥ ३ ॥
क्षिप्रहस्तं द्विजश्रेष्ठं कृतिनं चित्रयोधिनम् ।
दूरेषुपातिनं दान्तमस्त्रयुद्धेषु पारगम् ॥ ४ ॥
पाञ्चालपुत्रो न्यवधीद् दिव्यास्त्रधरमच्युतम् ।
कुर्वाणं दारुणं कर्म रणे यत्तं महारथम् ॥ ५ ॥

तात! द्रोणाचार्य तो शत्रुओंके लिये सर्वथा दुर्जय थे। वे सुवर्णमय पंखवाले बाणसमूहोंकी बारंबार वर्षा करते थे। उनके हाथोंमें फुर्ती थी। वे विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले और विद्वान् थे। दूरतक बाण मारनेवाले और अस्त्र-युद्धमें पारंगत थे। फिर उन जितेन्द्रिय दिव्यास्त्रधारी और अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले द्विजश्रेष्ठ द्रोणाचार्यको पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नने कैसे मार दिया? वे तो रणक्षेत्रमें कठोर कर्म करनेवाले, विजयके लिये प्रयत्नशील और महारथी वीर थे ॥ ३—५ ॥

व्यक्तं हि दैवं बलवत् पौरुषादिति मे मतिः ।
यद् द्रोणो निहतः शूरः पार्षतेन महात्मना ॥ ६ ॥

निश्चय ही पुरुषार्थकी अपेक्षा दैव ही प्रबल है, ऐसा मेरा विश्वास है; क्योंकि द्रोणाचार्य-जैसे शूरवीर महामना धृष्टद्युम्नके हाथसे मारे गये ॥ ६ ॥

अस्त्रं चतुर्विधं वीरे यस्मिन्नासीत् प्रतिष्ठितम् ।

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