महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 98, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंदशमोऽध्यायः
राजा धृतराष्ट्रका शोकसे व्याकुल होना और संजयसे युद्धविषयक प्रश्न
वैशम्पायन उवाच
एतत् पृष्ट्वा सूतपुत्रं हृच्छोकेनार्दितो भृशम् ।
जये निराशः पुत्राणां धृतराष्ट्रोऽपतत् क्षितौ ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! सूतपुत्र संजयसे इस प्रकार प्रश्न करते-करते हार्दिक शोकसे अत्यन्त पीड़ित हो अपने पुत्रोंकी विजयकी आशा टूट जानेके कारण राजा धृतराष्ट्र अचेत-से होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १ ॥
तं विसंज्ञं निपतितं सिषिचुः परिचारिकाः ।
जलेनात्यर्थशीतेन वीजन्त्यः पुण्यगन्धिना ॥ २ ॥
उस समय अचेत पड़े हुए राजा धृतराष्ट्रको उनकी दासियाँ पंखा झलने लगीं और उनके ऊपर परम सुगन्धित एवं अत्यन्त शीतल जल छिड़कने लगीं ॥ २ ॥
पतितं चैनमालोक्य समन्ताद् भरतस्त्रियः ।
परिवव्रुर्महाराजमस्पृशंश्चैव पाणिभिः ॥ ३ ॥
महाराजको गिरा देख धृतराष्ट्रकी बहुत-सी स्त्रियाँ उन्हें चारों ओरसे घेरकर बैठ गयीं और उन्हें हाथोंसे सहलाने लगीं ॥ ३ ॥
उत्थाप्य चैनं शनकै राजानं पृथिवीतलात् ।
आसनं प्रापयामासुर्बाष्पकण्ठ्यो वराननाः ॥ ४ ॥
फिर उन सुमुखी स्त्रियोंने राजाको धीरे-धीरे धरतीसे उठाकर सिंहासनपर बिठाया। उस समय उनके नेत्रोंसे आँसू झर रहे थे और कण्ठ गद्गद हो रहे थे ॥ ४ ॥
आसनं प्राप्य राजा तु मूर्च्छयाभिपरिप्लुतः ।
निश्चेष्टोऽतिष्ठत तदा वीज्यमानः समन्ततः ॥ ५ ॥
सिंहासनपर पहुँचकर भी राजा धृतराष्ट्र मूर्च्छासे पीड़ित हो निश्चेष्ट हो गये। उस समय सब ओरसे उनके ऊपर व्यजन डुलाया जा रहा था ॥ ५ ॥
स लब्ध्वा शनकैः संज्ञां वेपमानो महीपतिः ।
पुनर्गावलगणिं सूतं पर्यपृच्छद् यथातथम् ॥ ६ ॥
फिर धीरे-धीरे होशमें आनेपर काँपते हुए राजा धृतराष्ट्रने पुनः सूतजातीय संजयसे युद्धका यथावत् समाचार पूछा ॥ ६ ॥
धृतराष्ट्र उवाच