भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 982, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 982

मवारयद् राजवरोऽभिपत्य ॥ १२ ॥ उस समय सोनेका कवच और धनुष धारण किये, युद्धसे कभी पीठ न दिखानेवाले, राजाओंमें श्रेष्ठ अलम्बुषने अमर्षमें भरकर मधुकुलके महान् वीर सात्यकिको सहसा सामने आकर रोका ॥ १२ ॥ तयोर्भूद् भारत सम्प्रहारो यथाविधो नैव बभूव कश्चित् । प्रेक्षन्त एवाहवशोभिनौ तौ योधास्त्वदीयाश्च परे च सर्वे ॥ १३ ॥ भरतनन्दन! उन दोनोंका जैसा संग्राम हुआ, वैसा दूसरा कोई युद्ध नहीं हुआ था। आपके और शत्रुपक्षके समस्त योद्धा संग्राममें शोभा पानेवाले उन दोनों वीरोंको देखते ही रह गये थे ॥ १३ ॥ आविध्यदेनं दशभिः पृषत्कै- रलम्बुषो राजवरः प्रसह्य । अनागतानेव तु तान् पृषत्कां- श्चिच्छेद बाणैः शिनिपुङ्गवोऽपि ॥ १४ ॥ राजाओंमें श्रेष्ठ अलम्बुषने सात्यकिको बलपूर्वक दस बाण मारे। शिनिप्रवर सात्यकिने भी बाणोंद्वारा अपने पास आनेसे पहले ही उन समस्त बाणोंको काट गिराया ॥ १४ ॥ पुनः स बाणैस्त्रिभिरग्निकल्पै- राकर्णपूर्णैर्निशितैः सुपुङ्खैः । विव्याध देहावरणं विदार्य ते सात्यकेराविविशुः शरीरम् ॥ १५ ॥ तब अलम्बुषने धनुषको कानतक खींचकर अग्निके समान प्रज्वलित, सुन्दर पंखवाले तीन तीखे बाणोंद्वारा पुनः सात्यकिपर प्रहार किया। वे बाण सात्यकिके कवचको विदीर्ण करके उनके शरीरमें घुस गये ॥ १५ ॥ तैः कायमस्यान्यनिलप्रभावै- र्विदार्य बाणैर्निशितैर्ज्वलद्भिः । आजघ्निवांस्तान् रजतप्रकाशा- नश्वांश्चतुर्भिश्चतुरः प्रसह्य ॥ १६ ॥ अग्नि और वायुके समान प्रभावशाली उन प्रज्वलित तीखे बाणोंद्वारा सात्यकिका शरीर विदीर्ण करके अलम्बुषने चाँदीके समान चमकनेवाले उनके उन चारों घोड़ोंको भी चार बाणोंसे हठात् घायल कर दिया ॥ १६ ॥ तथा तु तेनाभिहतस्तरस्वी नप्ता शिनेश्चक्रधरप्रभावः ।