महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 981, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकः प्रविष्टः संक्रुद्धो नलिनीमिव कुञ्जरः ॥ ७ ॥ तस्य मे वृष्णिवीरस्य ब्रूहि युद्धं यथातथम् । धनंजय्यार्थे यत्तस्य कुशलो ह्यसि संजय ॥ ८ ॥ संजय! जैसे हाथी किसी पोखरेमें प्रवेश करता है, उसी प्रकार जिन्होंने अकेले ही कुपित होकर मेरी विशाल सेनाको क्षुब्ध करके बारंबार उसे मथकर उसके भीतर प्रवेश किया था, उन वृष्णिवंशी वीर सात्यकिने अर्जुनके लिये प्रयत्नपूर्वक जैसा युद्ध किया था, उसका वर्णन करो; क्योंकि तुम कथा कहनेमें कुशल हो ॥ ७-८ ॥
संजय उवाच
तथा तु वैकर्तनपीडितं तं भीमं प्रयान्तं पुरुषप्रवीरम् । समीक्ष्य राजन् नरवीरमध्ये शिनिप्रवीरोऽनुययौ रथेन ॥ ९ ॥ संजयने कहा—राजन्! पुरुषोंमें प्रमुख वीर भीमसेन अर्जुनके पास जाते समय जब पूर्वोक्त प्रकारसे कर्णद्वारा पीड़ित होने लगे, तब उन्हें उस अवस्थामें देखकर शिनिवंशके प्रधान वीर सात्यकिने उन नरवीरोंके समूहमें रथके द्वारा भीमसेनकी सहायताके लिये उनका अनुसरण किया ॥ ९ ॥
नदन् यथा वज्रधरस्तपान्ते ज्वलन् यथा जलदान्ते च सूर्यः । निघ्नन्नमित्रान् धनुषा दृढेन स कम्पयंस्तव पुत्रस्य सेनाम् ॥ १० ॥ जैसे वज्रधारी इन्द्र वर्षाकालमें मेघरूपसे गर्जना करते हैं और जैसे सूर्य शरत्कालमें प्रज्वलित होते हैं, उसी प्रकार गरजते और तेजसे प्रज्वलित होते हुए सात्यकि अपने सुदृढ़ धनुषद्वारा आपके पुत्रकी सेनाको कँपाते हुए शत्रुओंका संहार करने लगे ॥ १० ॥
तं यान्तमश्वै रजतप्रकाशै- रायोधने वीरवरं नदन्तम् । नाशक्नुवन् वारयितुं त्वदीयाः सर्वे रथा भारत माधवाग्र्यम् ॥ ११ ॥ भारत! उस युद्धस्थलमें रजतवर्णके अश्वोंद्वारा आगे बढ़ते और गर्जना करते हुए मधुवंशशिरोमणि वीरवर सात्यकिको आपके सारे रथी मिलकर भी रोक न सके ॥ ११ ॥
अमर्षपूर्णस्त्वनिवृत्तयोधी शरासनी काञ्चनवर्मधारी । अलम्बुषः सात्यकिं माधवाग्र्य-