महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 980, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
सात्यकिद्वारा राजा अलम्बुषका और दुःशासनके घोड़ोंका वध
धृतराष्ट्र उवाच
अहन्यहनि मे दीप्तं यशः पतति संजय। हता मे बहवो योधा मन्ये कालस्य पर्ययम्॥ १॥ **धृतराष्ट्र बोले—**संजय! प्रतिदिन मेरा उज्ज्वल यश घटता या मन्द पड़ता जा रहा है, मेरे बहुत-से योद्धा मारे गये, इसे मैं समयका ही फेर समझता हूँ॥ १॥
धनंजयः सुसंक्रुद्धः प्रविष्टो मामकं बलम्। रक्षितं द्रौणिकर्णाभ्यामप्रवेश्यं सुरैरपि॥ २॥ अश्वत्थामा और कर्णके द्वारा सुरक्षित मेरी सेनामें, जहाँ देवताओंका भी प्रवेश असम्भव था, क्रोधमें भरे हुए अर्जुन प्रविष्ट हो गये॥ २॥
ताभ्यामूर्जितवीर्याभ्यामाप्यायितपराक्रमः। सहितः कृष्णभीमाभ्यां शिनीनामृषभेण च॥ ३॥ महान् पराक्रमी श्रीकृष्ण और भीमसेन तथा शिनिप्रवर सात्यकिका साथ होनेसे अर्जुनका बल तथा पराक्रम और भी बढ़ गया है॥ ३॥
तदाप्रभृति मां शोको दहत्यग्निरिवाशयम्। ग्रस्तानिव प्रपश्यामि भूमिपालान् ससैन्धवान्॥ ४॥ जबसे यह बात मुझे मालूम हुई है, तबसे शोक मुझे उसी प्रकार दग्ध कर रहा है, जैसे काष्ठसे पैदा होनेवाली आग अपने आधारभूत काष्ठको ही जला देती है। मैं सिंधुराज जयद्रथसहित समस्त राजाओंको कालके गालमें गया हुआ ही समझता हूँ॥ ४॥
अप्रियं सुमहत् कृत्वा सिन्धुराजः किरीटिनः। चक्षुर्विषयमापन्नः कथं जीवितमाप्नुयात्॥ ५॥ सिंधुराज जयद्रथ किरीटधारी अर्जुनका महान् अप्रिय करके जब उनकी आँखोंके सामने आ गया है, तब कैसे जीवित रह सकता है?॥ ५॥
अनुमानाच्च पश्यामि नास्ति संजय सैन्धवः। युद्धं तु तद् यथावृत्तं तन्ममाचक्ष्व तत्त्वतः॥ ६॥ संजय! मैं अनुमानसे यह देख रहा हूँ कि सिंधुराज जयद्रथ अब जीवित नहीं है। अब वह युद्ध जिस प्रकार हुआ था, वह सब यथार्थरूपसे बताओ॥ ६॥
यश्च विक्षोभ्य महतीं सेनामालोड्य चासकृत्।