महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1006, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंतिर्यग्योनिष्वपि सतां स्नेहं पश्यत यादृशम् ॥ २९ ॥ ‘सबको अपने-अपने प्राण प्यारे होते हैं और सभी दूसरोंसे स्नेह पाते हैं। पशु-पक्षीकी योनिमें भी जो प्राणी रहते हैं, उनका अपनी संतानोंपर कैसा प्रेम है, इसे देखो ॥ २९ ॥ त्यक्त्वा कथं गच्छथेमं पद्मलोलायताक्षिकम् । यथा नवोद्वाहककृतं स्नानमाल्यविभूषितम् ॥ ३० ॥ इस बालककी कमल-जैसी चंचल एवं विशाल आँखें कितनी सुन्दर हैं। इसका शरीर स्नान एवं पुष्पमाला आदिसे विभूषित नया-नया विवाह करके आये दुल्हे जैसा है। ऐसे मनोहर बालकको छोड़कर जानेके लिये तुम्हारे पैर कैसे उठ रहे हैं?' ॥ ३० ॥ जम्बुकस्य वचः श्रुत्वा कृपणं परिदेवतः । न्यवर्तन्त तदा सर्वे शवार्थं ते स्म मानुषाः ॥ ३१ ॥ करुणाजनक विलाप करते हुए उस सियारकी यह बात सुनकर वे सभी मनुष्य उस मृत बालकके शरीरकी देख-रेखके लिये पुनः लौट आये ॥ ३१ ॥
गृध्र उवाच
अहो बत नृशंसेन जम्बुकेनाल्पमेधसा । क्षुद्रेणोक्ता हीनसत्त्वा मानुषाः किं निवर्तथ ॥ ३२ ॥ **तब गीधने कहा—**अहो! उस मन्दबुद्धि एवं क्रूर स्व भाववाले क्षुद्र गीदड़की बातोंमें आकर तुम लौटे कैसे आते हो? मनुष्यो! तुम बड़े धैर्यहीन हो ॥ ३२ ॥ पञ्चेन्द्रियपरित्यक्तं शुष्कं काष्ठत्वमागतम् । कस्माच्छोचथ तिष्ठन्तमात्मानं किं न शोचथ ॥ ३३ ॥ इस बच्चेका शरीर पाँचों इन्द्रियोंसे परित्यक्त होकर सूखे काठके समान तुम्हारे सामने पड़ा है। तुम इसके लिये क्यों शोक करते हो? एक दिन तुम्हारी भी यही दशा होगी, फिर अपने लिये क्यों नहीं शोक करते? ॥ ३३ ॥ तपः कुरुत वै तीव्रं मुच्यध्वं येन किल्बिषात् । तपसा लभ्यते सर्वं विलापः किं करिष्यति ॥ ३४ ॥ अब तुमलोग तीव्र तपस्या करो, जिससे समस्त पापोंसे छुटकारा पा जाओगे। तपस्यासे सब कुछ मिल सकता है। तुम्हारा यह विलाप क्या करेगा? ॥ ३४ ॥ अनिष्टानि च भाग्यानि जातानि सह मूर्तिना । येन गच्छति बालोऽयं दत्त्वा शोकमनन्तकम् ॥ ३५ ॥ भाग्य शरीरके साथ ही प्रकट होता है और उसका अनिष्ट फल भी सामने आता ही है, जिससे यह बालक तुम्हें अनन्त शोक देकर जा रहा है ॥ ३५ ॥ धनं गावः सुवर्णं च मणिरत्नमथापि च । अपत्यं च तपोमूलं तपयोगाच्च लभ्यते ॥ ३६ ॥