महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1028, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंषट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
नारदजीकी बात सुनकर वायुका सेमलको धमकाना और सेमलका वायुको तिरस्कृत करके विचारमग्न होना
भीष्म उवाच
एवमुक्त्वा तु राजेन्द्र शाल्मलिं ब्रह्मवित्तमः ।
नारदः पवने सर्वं शाल्मलेर्वाक्यमब्रवीत् ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजेन्द्र! सेमलसे ऐसा कहकर ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ नारदजीने वायुदेवके पास आकर उसकी सब बातें कह सुनायीं ॥ १ ॥
नारद उवाच
हिमवत्पृष्ठजः कश्चिच्छाल्मलिः परिवारवान् ।
बृहन्मूलो बृहच्छायः स त्वां वायोऽवमन्यते ॥ २ ॥
**नारदजीने कहा—**वायुदेव! हिमालयके पृष्ठभागपर एक सेमलका वृक्ष है, जो बहुत बड़े परिवारके साथ है। उसकी छाया विशाल और घनी है और जड़ें बहुत दूरतक फैली हैं। वह तुम्हारा अपमान करता है ॥ २ ॥
बहुव्याक्षेपयुक्तानि त्वामाह वचनानि सः ।
न युक्तानि मया वायो तानि वक्तुं तवाग्रतः ॥ ३ ॥
उसने तुम्हारे प्रति बहुत-से ऐसे आक्षेपयुक्त वचन कहे हैं, जिन्हें तुम्हारे सामने मुझे कहना उचित नहीं है ॥ ३ ॥
जानामि त्वामहं वायो सर्वप्राणभृतां वरम् ।
वरिष्ठं च गरिष्ठं च क्रोधे वैवस्वतं यथा ॥ ४ ॥
पवनदेव! मैं तुम्हें जानता हूँ। तुम समस्त प्राण-धारियोंमें श्रेष्ठ, महान् एवं गौरवशाली हो त था क्रोधमें वैवस्वत यमके समान हो ॥ ४ ॥
भीष्म उवाच
एतत् तु वचनं श्रुत्वा नारदस्य समीरणः ।
शाल्मलिं तमुपागम्य क्रुद्धो वचनमब्रवीत् ॥ ५ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! नारदजीकी यह बात सुनकर वायुदेवने शाल्मलिके पास जा कुपित होकर कहा ॥ ५ ॥
वायुरुवाच
शाल्मले नारदो गच्छंस्त्वयोक्तो मद्दिगर्हणम् ।