भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1029, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1029

अहं वायुः प्रभावं ते दर्शयाम्यात्मनो बलम् ॥ ६ ॥ **वायु बोले—**सेमल! तुमने इधरसे जाते हुए नारदजीसे मेरी निन्दा की है। मैं वायु हूँ। तुम्हें अपना बल और प्रभाव दिखाता हूँ ॥ ६ ॥ अहं त्वामभिजानामि विदितश्चासि मे द्रुम । पितामहः प्रजासर्गे त्वयि विश्रान्तवान् प्रभुः ॥ ७ ॥ वृक्ष! मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ। तुम्हारे विषयमें मुझे सब कुछ ज्ञात है। भगवान् ब्रह्माजीने प्रजाकी सृष्टि करते समय तुम्हारी छायामें विश्राम किया था ॥ ७ ॥ तस्य विश्रमणादेष प्रसादो मत्कृतस्तव । रक्ष्यसे तेन दुर्बुद्धे नात्मवीर्याद् द्रुमाधम ॥ ८ ॥ दुर्बुद्धे! उनके विश्राम करनेसे ही मैंने तुमपर यह कृपा की थी, इसीसे तुम्हारी रक्षा हो रही है। द्रुमाधम! तुम अपने बलसे नहीं बचे हुए हो ॥ ८ ॥ यन्मां त्वमवजानीषे यथान्यं प्राकृतं तथा । दर्शयाम्येष चात्मानं यथा मां नावमन्यसे ॥ ९ ॥ परंतु तुम अन्य प्राकृतिक मनुष्यकी भाँति जो मेरा अपमान कर रहे हो, इससे कुपित होकर मैं अपना वह स्वरूप दिखाऊँगा, जिससे तुम फिर मेरा अपमान नहीं करोगे ॥ ९ ॥

भीष्म उवाच

एवमुक्तस्ततः प्राह शाल्मलिः प्रहसन्निव । पवन त्वं च मे क्रुद्धो दर्शयात्मानमात्मना ॥ १० ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! पवनदेवके ऐसा कहनेपर सेमलने हँसते हुए-से कहा—'पवन! तुम कुपित होकर स्वयं ही अपनी सारी शक्ति दिखाओ ॥ १० ॥ मयि वै त्यज्यतां क्रोधः किं मे क्रुद्धः करिष्यसि । न ते बिभेमि पवन यद्यपि त्वं स्वयं प्रभुः ॥ ११ ॥ 'मेरे ऊपर अपना क्रोध उतारो। तुम कुपित होकर मेरा क्या कर लोगे। पवन! यद्यपि तुम स्वयं बड़े प्रभावशाली हो; फिर भी मैं तुमसे डरता नहीं हूँ ॥ ११ ॥ बलाधिकोऽहं त्वत्तश्च न भीः कार्या मया तव । ये तु बुद्ध्या हि बलिनस्ते भवन्ति बलीयसः ॥ १२ ॥ प्राणमात्रबला ये वै नैव ते बलिनो मताः । 'मैं बलमें तुमसे बहुत बढ़-चढ़कर हूँ; अतः मुझे तुमसे भय नहीं मानना चाहिये। जो बुद्धिके बली होते हैं, वे ही बलिष्ठ माने जाते हैं। जिनमें केवल शारीरिक बल होता है, वे वास्तवमें बलवान् नहीं समझे जाते' ॥ १२ १/२ ॥ इत्येवमुक्तः पवनः श्व इत्येवाब्रवीद् वचः ॥ १३ ॥ दर्शयिष्यामि ते तेजस्ततो रात्रिरुपागमत् ।