भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1030

सेमलके ऐसा कहनेपर वायुने कहा—'अच्छा, कल मैं तुम्हें अपना पराक्रम दिखाऊँगा।' इतनेमें ही रात आ गयी ॥ १३ १/२ ॥ अथ निश्चित्य मनसा शाल्मलिर्वातकारितम् ॥ १४ ॥ पश्यमानस्तदाऽऽत्मानमसमं मातरिश्वना । उस समय सेमलने वायुके द्वारा जो कुछ किया जानेवाला था, उसपर मन-ही-मन विचार करके तथा अपने आपको वायुके समान बलवान् न देखकर सोचा— ॥ १४ १/२ ॥ नारदे यन्मया प्रोक्तं वचनं प्रति तन्मृषा ॥ १५ ॥ असमर्थो ह्यहं वायोर्बलेन बलवान् हि सः । 'अहो! मैंने नारदजीसे जो बातें कही थीं, वे सब झूठी थीं। मैं वायुका सामना करनेमें असमर्थ हूँ; क्योंकि वे बलमें मुझसे बढ़े हुए हैं ॥ १५ १/२ ॥ मारुतो बलवान् नित्यं यथा वै नारदोऽब्रवीत् ॥ १६ ॥ अहं तु दुर्बलोऽन्येभ्यो वृक्षेभ्यो नात्र संशयः । किं तु बुद्ध्या समो नास्ति मया कश्चिद् वनस्पतिः ॥ १७ ॥ 'जैसा कि नारदजीने कहा था, वायुदेव नित्य बलवान् हैं। मैं तो दूसरे वृक्षोंसे भी दुर्बल हूँ, इसमें संशय नहीं है; परंतु बुद्धिमें कोई भी वृक्ष मेरे समान नहीं है ॥ १६-१७ ॥ तदहं बुद्धिमास्थाय भयं मोक्ष्ये समीरणात् । यदि तां बुद्धिमास्थाय तिष्ठेयुः पर्णिनो वने ॥ १८ ॥ अरिष्टाः स्युः सदा क्रुद्धात् पवनान्नात्र संशयः । 'मैं बुद्धिका आश्रय लेकर वायुके भयसे छुटकारा पाऊँगा। यदि वनमें रहनेवाले दूसरे वृक्ष भी उसी बुद्धिका सहारा लेकर रहें तो निःसंदेह कुपित वायुसे उनका कोई अनिष्ट नहीं होगा ॥ १८ १/२ ॥ ते तु बाला न जानन्ति यथा वै तान् समीरणः । समीरयति संक्रुद्धो यथा जानाम्यहं तथा ॥ १९ ॥ 'परंतु वे मूर्ख हैं; अतः वायुदेव जिस प्रकार कुपित होकर उन्हें दबाते हैं, उसका उन्हें ज्ञान नहीं है। मैं यह सब अच्छी तरह जानता हूँ' ॥ १९ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि पवनशाल्मलिसंवादे षट्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें पवन-शाल्मलि-संवादविषयक एक सौ छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५६ ॥