महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1031, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
सेमलका हार स्वीकार करना तथा बलवान्के साथ वैर न करनेका उपदेश
भीष्म उवाच
ततो निश्चित्य मनसा शाल्मलिः क्षुभितस्तदा ।
शाखाः स्कन्धान् प्रशाखाश्च स्वयमेव व्यशातयत् ॥ १ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! मन-ही-मन ऐसा विचारकर सेमलने क्षुभित हो अपनी शाखाओं, डालियों तथा टहनियोंको स्वयं ही नीचे गिरा दिया ॥ १ ॥
स परित्यज्य शाखाश्च पत्राणि कुसुमानि च ।
प्रभाते वायुमायान्तं प्रत्यैक्षत वनस्पतिः ॥ २ ॥
वह वनस्पति अपनी शाखाओं, पत्तों और फूलोंको त्यागकर प्रातःकाल वायुके आनेकी प्रतीक्षा करने लगा ॥ २ ॥
ततः क्रुद्धः श्वसन् वायुः पातयन् वै महाद्रुमान् ।
आजगामाथ तं देशमास्ते यत्र स शाल्मलिः ॥ ३ ॥
तत्पश्चात् सबेरा होनेपर वायुदेव कुपित हो बड़े-बड़े वृक्षोंको धराशायी करते हुए उस स्थानपर आये, जहाँ वह सेमलका वृक्ष था ॥ ३ ॥
तं हीनपर्णं पतिताग्रशाखं
निशीर्णपुष्पं प्रसमीक्ष्य वायुः ।
उवाच वाक्यं स्मयमान एवं
मुदा युतः शाल्मलिमुग्रशाखम् ॥ ४ ॥
वायुने देखा कि सेमलके पत्ते गिर गये हैं और उसकी श्रेष्ठ शाखाएँ धराशायी हो गयी हैं। यह फूलोंसे भी हीन हो चुका है, तब वे बड़े प्रसन्न हुए और जिसकी शाखाएँ पहले बड़ी भयंकर थीं, उस सेमलसे मुसकराते हुए इस प्रकार बोले ॥ ४ ॥
वायुरुवाच
अहमप्येवमेव त्वां कुर्वाणः शाल्मले रुषा ।
आत्मना यत्कृतं कृच्छ्रं शाखानामपकर्षणम् ॥ ५ ॥
हीनपुष्पाग्रशाखस्त्वं शीर्णाङ्कुरपलाशकः ।
आत्मदुर्मन्त्रितेनेह मद्धैर्यवशगः कृतः ॥ ६ ॥
**वायुने कहा—**शाल्मले! मैं भी रोषमें भरकर तुम्हें ऐसा ही बना देना चाहता था। तुमने स्वयं ही यह कष्ट स्वीकार कर लिया है, तुम्हारी शाखाएँ गिर गयीं, फूल पत्ते, डालियाँ और