महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअंकुर सभी नष्ट हो गये। तुमने अपनी ही कुमतिसे यह विपत्ति मोल ली है। तुम्हें मेरे बल और पराक्रमका शिकार बनना पड़ा है ॥ ५-६ ॥
भीष्म उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचो वायोः शाल्मलिर्व्रीडितस्तदा । अतप्यत वचः स्मृत्वा नारदो यत् तदाब्रवीत् ॥ ७ ॥ भीष्मजी कहते हैं— राजन्! वायुका यह वचन सुनकर सेमल उस समय लज्जित हो गया और नारदजीने जो कुछ कहा था, उसे याद करके वह बहुत पछताने लगा ॥ ७ ॥
एवं हि राजशार्दूल दुर्बलः सन् बलीयसा । वैरमारभते बालस्तप्यते शाल्मलिर्यथा ॥ ८ ॥ नृपश्रेष्ठ! इसी प्रकार जो मूर्ख मनुष्य स्वयं दुर्बल होकर किसी बलवान्के साथ वैर बाँध लेता है, वह सेमलके समान ही संतापका भागी होता है ॥ ८ ॥
तस्माद् वैरं न कुर्वीत दुर्बलो बलवत्तरैः । शोचेद्धि वैरं कुर्वाणो यथा वै शाल्मलिस्तथा ॥ ९ ॥ अतः दुर्बल मनुष्य बलवानोंके साथ वैर न करे। यदि वह करता है तो सेमलके समान ही शोचनीय दशाको पहुँचकर शोकमग्न होता है ॥ ९ ॥
न हि वैरं महात्मानो विवृण्वन्त्यपकारिषु । शनैः शनैर्महाराज दर्शयन्ति स्म ते बलम् ॥ १० ॥ महाराज! महामनस्वी पुरुष अपनी बुराई करने-वालोंपर वैरभाव नहीं प्रकट करते हैं। वे धीरे-धीरे ही अपना बल दिखाते हैं ॥ १० ॥
वैरं न कुर्वीत नरो दुर्बुद्धिर्बुद्धिजीविना । बुद्धिर्बुद्धिमतो याति तृणेष्विव हुताशनः ॥ ११ ॥ खोटी बुद्धिवाला मनुष्य किसी बुद्धिजीवी पुरुषसे वैर न बाँधे; क्योंकि घास-फूँसपर फैलनेवाली आगके समान बुद्धिमानोंकी बुद्धि सर्वत्र पहुँच जाती है ॥ ११ ॥
न हि बुद्ध्या समं किंचिद् विद्यते पुरुषे नृप । तथा बलेन राजेन्द्र न समोऽस्तीह कश्चन ॥ १२ ॥ नरेश्वर! राजेन्द्र! पुरुषमें बुद्धिके समान दूसरी कोई वस्तु नहीं है। संसारमें जो बुद्धि-बलसे युक्त है, उसकी समानता करनेवाला दूसरा कोई पुरुष नहीं है ॥ १२ ॥
तस्मात् क्षमेत बालाय जडान्धबधिराय च । बलाधिकाय राजेन्द्र तद् दृष्टं त्वयि शत्रुहन् ॥ १३ ॥ शत्रुओंका नाश करनेवाले राजेन्द्र! इसलिये जो बालक, जड, अन्ध, बधिर, तथा बलमें अपनेसे बढ़ा-चढ़ा हो, उसके द्वारा किये गये प्रतिकूल बर्ताव को भी क्षमा कर देना चाहिये; यह क्षमाभाव तुम्हारे भीतर विद्यमान है ॥ १३ ॥