महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1033, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंअक्षौहिण्यो दशैका च सप्त चैव महाद्युते ।
बलेन न समा राजन्नर्जुनस्य महात्मनः ॥ १४ ॥
महातेजस्वी नरेश! अठारह अक्षौहिणी सेनाएँ भी बलमें महात्मा अर्जुनके समान नहीं हैं ॥ १४ ॥
निहताश्चैव भग्नाश्च पाण्डवेन यशस्विना ।
चरता बलमास्थाय पाकशासनिना मृधे ॥ १५ ॥
इन्द्र और पाण्डुके यशस्वी पुत्र अर्जुनने अपने बलका भरोसा करते हुए युद्धमें विचरते हुए यहाँ उन समस्त सेनाओंको मार डाला और भगा दिया ॥ १५ ॥
उक्ताश्च ते राजधर्मा आपद्धर्माश्च भारत ।
विस्तरेण महाराज किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ १६ ॥
भरतनन्दन! महाराज! मैंने तुमसे राजधर्म और आपद्धर्मका विस्तारपूर्वक वर्णन किया है, अब और क्या सुनना चाहते हो ॥ १६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि पवनशाल्मलिसंवादे
सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें पवन-शाल्मलिसंवादविषयक एक सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५७ ॥