महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1171, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंमनुष्ययोनिमिच्छन्ति सर्वभूतानि सर्वशः । मनुष्यत्वे च विप्रत्वं सर्व एवाभिनन्दति ॥ ८ ॥ ‘मुने! सभी प्राणी सब प्रकारसे मनुष्ययोनि पानेकी इच्छा रखते हैं। उसमें भी ब्राह्मणत्वकी प्रशंसा तो सभी लोग करते हैं॥ ८॥
मनुष्यो ब्राह्मणश्चासि श्रोत्रियश्चासि काश्यप । सुदुर्लभमवाप्यैतन्न दोषान्मर्तुमर्हसि ॥ ९ ॥ ‘काश्यप! आप तो मनुष्य हैं, ब्राह्मण हैं और श्रोत्रिय भी हैं। ऐसा परम दुर्लभ शरीर पाकर आपको उसमें दोषदृष्टि करके स्वयं ही मरनेके लिये उद्यत होना उचित नहीं है॥ ९॥
सर्वे लाभाः साभिमाना इति सत्यवती श्रुतिः । संतोषणीयरूपोऽसि लोभाद् यदभिमन्यसे ॥ १० ॥ ‘संसारमें जितने लाभ हैं, वे सभी अभिमानपूर्ण हैं, ऐसा सत्य अर्थका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिका कथन है (अर्थात् मैंने यह लाभ अपने पुरुषार्थसे किया है, ऐसा अहंकार प्रायः सभी मनुष्य कर लेते हैं)। आपका स्वरूप तो संतोष रखनेके योग्य है। आप लोभवश ही उसकी अवहेलना करते हैं॥ १०॥
अहो सिद्धार्थता तेषां येषां सन्तीह पाणयः । अतीव स्पृहये तेषां येषां सन्तीह पाणयः ॥ ११ ॥ ‘अहो! जिनके पास भगवान्के दिये हुए हाथ हैं, उनको तो मैं कृतार्थ मानता हूँ। इस जगत्में जिनके पास एकसे अधिक हाथ हैं, उनके-जैसा सौभाग्य पानेकी इच्छा मुझे बारंबार होती है॥ ११॥
पाणिमद्भ्यः स्पृहास्माकं यथा तव धनस्य वै । न पाणिलाभादधिको लाभः कश्चन विद्यते ॥ १२ ॥ ‘जैसे आपके मनमें धनकी लालसा है, उसी प्रकार हम पशुओंको हाथवाले मनुष्योंसे हाथ पानेकी अभिलाषा रहती है। हमारी दृष्टिमें हाथ मिलनेसे अधिक दूसरा कोई लाभ नहीं ॥ १२॥
अपाणित्वाद् वय ब्रह्मन् कण्टकं नोद्धरामहे । जन्तूनुच्चावचानङ्गे दशतो न कषाम वा ॥ १३ ॥ ‘ब्रह्मन्! हमारे शरीरमें काँटे गड़ जाते हैं; परंतु हाथ न होनेसे हम उन्हें निकाल नहीं पाते हैं। जो छोटे-बड़े जीव-जन्तु हमारे शरीरमें डँसते हैं, उनको भी हम हटा नहीं सकते ॥ १३॥
अथ येषां पुनः पाणी देवदत्तौ दशाङ्गुली । उद्धरन्ति कृमीनङ्गाद् दशतो निकषन्ति च ॥ १४ ॥