महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1176, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंयज्ञादिके द्वारा विहार करते हुए महान् सुख पा सकते हैं ॥ ४४ ॥
उत जाताः सुनक्षत्रे सुतिथौ सुमुहूर्तजाः ।
यज्ञदानप्रजेहायां यतन्ते शक्तिपूर्वकम् ॥ ४५ ॥
‘जो उत्तम नक्षत्र, उत्तम तिथि और उत्तम मुहूर्तमें पैदा हुए हैं, वे अपनी शक्तिके अनुसार यज्ञ एवं दान करते और न्यायाानुकूल संतानोत्पादनकी चेष्टा भी करते हैं ॥ ४५ ॥
नक्षत्रेष्वासुरेष्वन्ये दुस्तिथौ दुर्मुहूर्तजाः ।
सम्पतन्त्यासुरीं योनिं यज्ञप्रसववर्जिताः ॥ ४६ ॥
‘दूसरे जो लोग आसुर नक्षत्र, दूषित तिथि तथा अशुभ मुहूर्तमें उत्पन्न होते हैं, वे यज्ञ तथा संतानसे रहित होकर आसुरी योनिमें पड़ते हैं ॥ ४६ ॥
अहमासं पण्डितको हेतुको वेदनिन्दकः ।
आन्वीक्षिकीं तर्कविद्यामनुरक्तो निरर्थिकाम् ॥ ४७ ॥
‘पूर्वजन्ममें मैं एक पण्डित था और कुतर्कका आश्रय लेकर वेदोंकी निन्दा करता था। प्रत्यक्षके आधारपर अनुमानको प्रधानता देनेवाली थोथी तर्कविद्यापर ही उस समय मेरा अधिक अनुराग था ॥ ४७ ॥
हेतुवादान् प्रवदिता वक्ता संसत्सु हेतुमत् ।
आक्रोष्टा चाभिवक्ता च ब्रह्मवाक्येषु च द्विजान् ॥ ४८ ॥
‘मैं सभाओंमें जाकर तर्क और युक्तिकी बातें ही अधिक बोलता। जहाँ दूसरे ब्राह्मण श्रद्धापूर्वक वेद-वाक्योंपर विचार करते, वहाँ मैं बलपूर्वक आक्रमण करके उन्हें खरी-खोटी सुना देता और स्वयं ही अपना तर्कवाद बका करता था ॥ ४८ ॥
नास्तिकः सर्वशङ्की च मूर्खः पण्डितमानिकः ।
तस्येयं फलनिर्वृत्तिः शृगालत्वं मम द्विज ॥ ४९ ॥
‘मैं नास्तिक, सबपर संदेह करनेवाला तथा मूर्ख होकर भी अपनेको पण्डित माननेवाला था। विप्रवर! यह शृगालयोनि मेरे उसी कुकर्मका फल है ॥ ४९ ॥
अपि जातु तथा तस्मादहोरात्रशतैरपि ।
यदहं मानुषीं योनिं शृगालः प्राप्नुयां पुनः ॥ ५० ॥
अब मैं सैकड़ों दिन-रातोंतक साधन करके भी क्या कभी वह उपाय कर सकता हूँ, जिससे आज सियारकी योनिमें पड़ा हुआ मैं पुनः वह मनुष्ययोनि पा सकूँ ॥
संतुष्टश्चाप्रमत्तश्च यज्ञदानतपोरतिः ।
ज्ञेयज्ञाता भवेयं वै वर्ज्यवर्जयिता तथा ॥ ५१ ॥
‘जिस मनुष्ययोनिमें मैं संतुष्ट और सावधान रहकर यज्ञ, दान और तपस्यामें लगा रह सकूँ, जिसमें मैं जाननेयोग्य वस्तुको जान लूँ और त्यागनेयोग्य वस्तुका त्याग कर दूँ’ ॥ ५१ ॥
ततः स मुनिरुत्थाय काश्यपस्तमुवाच ह ।