महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1175, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंन पुल्कसो न चाण्डाल आत्मानं त्यक्तुमिच्छति । तया तुष्टः स्वया योन्या मायां पश्यस्व यादृशीम् ॥ ३८ ॥ 'भंगी अथवा चाण्डाल भी अपने शरीरको त्यागना नहीं चाहता है, वह अपनी उसी योनिसे संतुष्ट रहता है। देखिये, भगवान्की कैसी माया है? ॥ ३८ ॥
दृष्ट्वा कुणीन् पक्षहतान् मनुष्यानामयाविनः । सुसम्पूर्णः स्वया योन्या लब्धलाभोऽसि काश्यप ॥ ३९ ॥ 'काश्यप! कुछ मनुष्य लूले और लँगड़े हैं, कुछ लोगोंको लकवा मार गया है, बहुत-से मनुष्य निरन्तर रोगी ही रहते हैं। उन सबकी ओर देखकर यह कहना पड़ता है कि आप अपनी योनिके अनुसार नीरोग और परिपूर्ण अंगवाले हैं। आपको मानवशरीरका लाभ मिल चुका है ॥ ३९ ॥
यदि ब्राह्मण देहस्ते निरातङ्को निरामयः । अङ्गानि च समग्राणि न च लोकेषु धिक्कृतः ॥ ४० ॥ 'ब्राह्मणदेव! यदि आपका शरीर निर्भय और नीरोग है, आपके सारे अंग ठीक हैं, किसीमें कोई विकार नहीं आया है तो लोकमें कोई भी आपको धिक्कार नहीं सकता—आप धिक्कारके पात्र नहीं हो सकते ॥ ४० ॥
न केनचित् प्रवादेन सत्येनैवापहारिणा । धर्मायोत्तिष्ठ विप्रर्षे नात्मानं त्यक्तुमर्हसि ॥ ४१ ॥ 'यदि आपपर जातिच्युत करनेवाला कोई सच्चा कलंक लगा हो तो भी आपको प्राणत्यागका विचार नहीं करना चाहिये। ब्रह्मर्षे! आप धर्मपालनके लिये उठ खड़े होइये ॥ ४१ ॥
यदि ब्रह्मन् शृणोष्येतच्छ्रद्दधासि च मे वचः । वेदोक्तस्यैव धर्मस्य फलं मुख्यमवाप्स्यसि ॥ ४२ ॥ 'ब्रह्मन्! यदि आप मेरी बात सुनेंगे और उसपर श्रद्धा करेंगे तो आपको वेदोक्त धर्मके पालनका ही मुख्य फल प्राप्त होगा ॥ ४२ ॥
स्वाध्यायमग्निसंस्कारमप्रमत्तोऽनुपालय । सत्यं दमं च दानं च स्पर्धिष्ठा मा च केनचित् ॥ ४३ ॥ 'आप सावधान होकर स्वाध्याय, अग्निहोत्र, सत्य, इन्द्रियसंयम तथा दानधर्मका पालन कीजिये। किसीके साथ स्पर्धा न कीजिये ॥ ४३ ॥
ये केचन स्वध्ययनाः प्राप्ता यजनयाजनम् । कथं ते चानुशोचेयुर्धायेयुर्वाप्यशोभनम् । इच्छन्तस्ते विहाराय सुखं महदवाप्नुयुः ॥ ४४ ॥ 'जो ब्राह्मण स्वाध्यायमें लगे रहते हैं तथा यज्ञ करते और कराते हैं, वे किसी प्रकारकी चिन्ता क्यों करेंगे और कोई आत्महत्या आदि बुरी बात भी क्यों सोचेंगे? वे यदि चाहें तो