भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 1174, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 1174

संस्पर्शाद् दर्शनाद् वापि श्रवणाद् वापि जायते ॥ ३० ॥ ‘जो किसी विषयका रस नहीं जानता, उसके मनमें कभी उसकी कामना भी नहीं होती। स्पर्शसे, दर्शनसे अथवा श्रवणसे भी कामनाका उदय होता है ॥ ३० ॥ न त्वं स्मरसि वारुण्या लट्‌वाकानां च पक्षिणाम् । ताभ्यां चाभ्यधिको भक्ष्यो न कश्चिद् विद्यते क्वचित् ॥ ३१ ॥ ‘वारुणी मदिरा तथा चिड़िया—इन दोनोंका आप कभी स्मरण नहीं करते होंगे; क्योंकि इनको आपने नहीं खाया है; परंतु (जो तामसी मनुष्य इनको खाते हैं उनके लिये) कहीं और कोई भी भक्ष्य पदार्थ उन दोनोंसे बढ़कर नहीं है ॥ ३१ ॥ यानि चान्यानि भूतेषु भक्ष्यजातानि कस्यचित् । येषामभुक्तपूर्वाणि तेषामस्मृतिरेव ते ॥ ३२ ॥ ‘प्राणियोंमें किसीके भी जो अन्यान्य भक्ष्य पदार्थ हैं, जिनका तुमने पहले उपभोग नहीं किया है, उन भोजनोंकी स्मृति तुमको कभी नहीं होगी ॥ ३२ ॥ अप्राशनमसंस्पर्शमसंदर्शनमेव च । पुरुषस्यैष नियमो मन्ये श्रेयो न संशयः ॥ ३३ ॥ ‘मैं ऐसा मानता हूँ कि किसी वस्तुको न खाने, न छूने और न देखनेका नियम लेना ही पुरुषके लिये कल्याणकारी है, इसमें संशय नहीं ॥ ३३ ॥ पाणिमन्तो बलवन्तो धनवन्तो न संशयः । मनुष्या मानुषैरेव दासत्वमुपपादिताः ॥ ३४ ॥ ‘जिनके दोनों हाथ बने हुए हैं, निस्संदेह वे ही बलवान् और धनवान् हैं। मनुष्योंको तो मनुष्योंने ही दास बना रखा है ॥ ३४ ॥ वधबन्धपरिक्लेशैः क्लिश्यन्ते च पुनः पुनः । ते खल्वपि रमन्ते च मोदन्ते च हसन्ति च ॥ ३५ ॥ ‘कितने ही मनुष्य बारंबार वध और बन्धनके क्लेश भोगते रहते हैं, परंतु वे भी (आत्महत्या करके प्राण नहीं देते, बल्कि) आपसमें क्रीड़ा करते, आनन्दित होते और हँसते हैं ॥ ३५ ॥ अपरे बाहुबलिनः कृतविद्या मनस्विनः । जुगुप्सितां च कृपणां पापवृत्तिमुपासते ॥ ३६ ॥ ‘दूसरे बहुत-से बाहुबलसे सम्पन्न विद्वान् और मनस्वी मनुष्य दीन, निन्दित एवं पापपूर्ण वृत्तिसे जीविका चलाते हैं ॥ ३६ ॥ उत्साहन्ते च ते वृत्तिमन्यामप्युपसेवितुम् । स्वकर्मणा तु नियतं भवितव्यं तु तत् तथा ॥ ३७ ॥ ‘वे दूसरी वृत्तिका सेवन करनेके लिये भी उत्साह रखते हैं; परंतु अपने कर्मके अनुसार जो नियत है, वैसा ही भविष्यमें होता है ॥ ३७ ॥

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