भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 1202

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षडशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

जीवकी सत्तापर नाना प्रकारकी युक्तियोंसे शंका उपस्थित करना

भरद्वाज उवाच

यदि प्राणयते वायुर्वायुरेव विचेष्टते ।
श्वसित्याभाषते चैव तस्माज्जीवो निरर्थकः ॥ १ ॥
भरद्वाजने पूछा— भगवन्! यदि वायु ही प्राणीको जीवित रखती है, वायु ही शरीरको चेष्टाशील बनाती है, वही साँस लेती और वही बोलती भी है, तब तो इस शरीरमें जीवकी सत्ता स्वीकार करना व्यर्थ ही है ॥ १ ॥

यद्यूष्मभाव आग्नेयो वह्निना पच्यते यदि ।
अग्निर्जरयते चैतत् तस्माज्जीवो निरर्थकः ॥ २ ॥
यदि शरीरमें गर्मी अग्निका अंश है, यदि अग्निसे ही खाये हुए अन्नका परिपाक होता है, यदि अग्नि ही सबको जीर्ण करती है, तब तो जीवकी सत्ता मानना व्यर्थ ही है ॥ २ ॥

जन्तोः प्रमीयमाणस्य जीवो नैवोपलभ्यते ।
वायुरेव जहात्येनमूष्मभावश्च नश्यति ॥ ३ ॥
जब किसी प्राणीकी मृत्यु होती है; तब वहाँ जीवकी उपलब्धि नहीं होती। प्राणवायु ही इस प्राणीका परित्याग करती है और शरीरकी गर्मी नष्ट हो जाती है ॥ ३ ॥

यदि वायुमयो जीवः संश्लेषो यदि वायुना ।
वायुमण्डलवद् दृश्यो गच्छेत् सह मरुद्गणैः ॥ ४ ॥
यदि जीव वायुमय है, यदि वायुसे उसका घनिष्ठ सम्पर्क है, तब तो वायुमण्डलके समान उसे प्रत्यक्ष अनुभवमें आना चाहिये। वह मृत्युके पश्चात् वायुके साथ ही जाता हुआ दिखायी देना चाहिये ॥ ४ ॥

संश्लेषो यदि वातेन यदि तस्मात् प्रणश्यति ।
महार्णवविमुक्तत्वादन्यत् सलिलभाजनम् ॥ ५ ॥
यदि वायुके साथ जीवका दृढ़ संयोग है और उसीके कारण वह वायुके साथ ही नष्ट हो जाता है, तब तो जैसे जलपात्रमें पत्थर भरकर उसे कोई समुद्रमें डाल दे और वह डूब जाय, उसी प्रकार वायुके सम्पर्कसे ही जीवका विनाश मानना पड़ेगा। उस दशामें जैसे प्रस्तरसे पृथक् जलपात्रकी उपलब्धि होती है, उसी प्रकार प्राणवायुसे पृथक् जीवकी उपलब्धि होनी चाहिये ॥ ५ ॥

कूपे वा सलिलं दद्यात् प्रदीपं वा हुताशने ।