महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1221, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्वर्गमें अत्यन्त सुखदायिनी हवा चलती है। मनोहर सुगन्ध छायी रहती है। भूख, प्यास, परिश्रम, बुढ़ापा और पापके फलका कष्ट वहाँ कभी नहीं भोगना पड़ता है ।। १३ ।।
नित्यमेव सुखं स्वर्गे सुखं दुःखमिहोभयम् ।
नरके दुःखमेवाहुः सुखं तत्परमं पदम् ।। १४ ।।
स्वर्गमें सदा सुख ही होता है। इस मर्त्यलोकमें सुख और दुःख दोनों होते हैं। नरकमें केवल दुःख-ही-दुःख बताया गया है। वास्तविक सुख तो वह परमपदस्वरूप परब्रह्म परमात्मा ही है ।। १४ ।।
पृथिवी सर्वभूतानां जनित्री तद्विधाः स्त्रियः ।
पुमान् प्रजापतिस्तत्र शुक्रं तेजोमयं विदुः ।। १५ ।।
पृथिवी सम्पूर्ण भूतोंकी जननी है। संसारकी स्त्रियाँ भी पृथ्वीके समान ही संतानकी जननी होती हैं। पुरुष ही वहाँ प्रजापतिके समान है। पुरुषका जो वीर्य है, उसे तेजःस्वरूप समझा जाता है ।। १५ ।।
इत्येतल्लोकनिर्माणं ब्रह्मणा विहितं पुरा ।
प्रजाः समनुवर्तन्ते स्वैः स्वैः कर्मभिरावृताः ।। १६ ।।
पूर्वकालमें ब्रह्माजीने इस स्त्री-पुरुषस्वरूप जगत्की सृष्टि की थी। यहाँ समस्त प्रजा अपने-अपने कर्मोंसे आवृत होकर सुख-दुःखका अनुभव करती है ।। १६ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि भृगुभरद्वाजसंवादे
नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १९० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें भृगु-भरद्वाजसंवादविषयक एक सौ नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १९० ।।