महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1227, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः
वानप्रस्थ और संन्यास धर्मोंका वर्णन तथा हिमालयके उत्तर पार्श्वमें स्थित उत्कृष्ट लोककी विलक्षणता एवं महत्ताका प्रतिपादन, भृगु-भरद्वाज-संवादका उपसंहार
भृगुरुवाच
वानप्रस्थाः खल्वपि धर्ममनुसरन्तः पुण्यानि तीर्थानि नदीप्रस्रवणानि सुविविक्तेष्वरण्येषु मृगमहिषवराहशार्दूलवनगजाकीर्णेषु तपस्यन्तोऽनुसंचरन्ति त्यक्तग्राम्यवस्त्राभ्यवहारोपभोगा वन्यौषधि-फलमूलपर्णपरिमितविचित्रनियताहाराः स्थानास-निनो भूमिपाषाणसिकताशर्करावालुकाभस्म-शायिनः काशकुशचर्मवल्कलसंवृताङ्गाः केश-श्मश्रुनखरोमधारिणो नियतकालोपस्पर्शना अस्क-न्दितकालबलिहोमानुष्ठायिनः समित्कुशकुसुमापहा-रसम्मार्जनलब्धविश्रामाः शीतोष्णवर्षपवनविष्टम्भवि-भिन्नसर्वत्वचो विविधनियमोपयोगचर्यानुष्ठानविहि-तपरिशुष्कमांसशोणितत्वगस्थिभूता धृतिपराः सत्त्व-योगाच्छरीराण्युद्वहन्ते ॥ १ ॥
भृगुजी कहते हैं—मुने! तीसरे आश्रम वानप्रस्थका पालन करनेवाले मनुष्य धर्मका अनुसरण करते हुए पवित्र तीर्थोंमें, नदियोंके किनारे, झरनोंके आसपास तथा मृग, भैंसे, सूअर, सिंह एवं जंगली हाथियोंसे भरे हुए एकान्त वनोंमें तप करते हुए विचरते रहते हैं। गृहस्थोंके उपभोगमें आनेवाले ग्रामजनोचित सुन्दर वस्त्र, स्वादिष्ट भोजन और विषयभोगोंका परित्याग करके वे जंगलमें अपने-आप होनेवाले अन्न, फल, मूल तथा पत्तोंका परिमित, विचित्र एवं नियत आहार करते हैं। भूमिपर ही बैठते हैं। जमीन, पत्थर, रेत, कँकरीली मिट्टी, बालू अथवा राखपर ही सोते हैं। काश, कुश, मृगचर्म और वृक्षोंकी छालसे बने वस्त्रोंसे अपना शरीर ढकते हैं। सिरके बाल, दाढ़ी, मूँछ, नख और रोम सदा धारण किये रहते हैं। नियत समयपर स्नान करके निश्चित कालका उल्लंघन न करते हुए बलिवैश्वदेव तथा अग्निहोत्र आदि कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं। सबेरे हवन-पूजनके लिये समिधा, कुशा और फूल आदिका संग्रह करके आश्रमको झाड़-बुहार लेनेके पश्चात् उन्हें कुछ विश्राम मिलता है। सर्दी गर्मी, वर्षा और हवाका वेग सहते-सहते उनके शरीरके चमड़े फट जाते हैं। नाना प्रकारके नियमोंका पालन और सत्कर्मोंका अनुष्ठान करते रहनेसे उनके रक्त और मांस सूख जाते हैं और शरीरकी जगह चामसे ढँकी हुई हड्डियोंका ढाँचामात्र रह जाता है; फिर भी धैर्य रखकर साहसपूर्वक शरीरका भार ढोते रहते हैं ॥ १ ॥
यस्त्वेतां नियतश्चर्यां ब्रह्मर्षिविहितां चरेत् स दहेदग्निवद्दोषाञ् जयेल्लोकांश्च दुर्जयान् ॥ २ ॥