महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
वानप्रस्थ और संन्यास धर्मोंका वर्णन तथा हिमालयके उत्तर पार्श्वमें स्थित उत्कृष्ट लोककी विलक्षणता एवं महत्ताका प्रतिपादन, भृगु-भरद्वाज-संवादका उपसंहार
द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः
वानप्रस्थ और संन्यास धर्मोंका वर्णन तथा हिमालयके उत्तर पार्श्वमें स्थित उत्कृष्ट लोककी विलक्षणता एवं महत्ताका प्रतिपादन, भृगु-भरद्वाज-संवादका उपसंहार
भृगुरुवाच
वानप्रस्थाः खल्वपि धर्ममनुसरन्तः पुण्यानि तीर्थानि नदीप्रस्रवणानि सुविविक्तेष्वरण्येषु मृगमहिषवराहशार्दूलवनगजाकीर्णेषु तपस्यन्तोऽनुसंचरन्ति त्यक्तग्राम्यवस्त्राभ्यवहारोपभोगा वन्यौषधि-फलमूलपर्णपरिमितविचित्रनियताहाराः स्थानास-निनो भूमिपाषाणसिकताशर्करावालुकाभस्म-शायिनः काशकुशचर्मवल्कलसंवृताङ्गाः केश-श्मश्रुनखरोमधारिणो नियतकालोपस्पर्शना अस्क-न्दितकालबलिहोमानुष्ठायिनः समित्कुशकुसुमापहा-रसम्मार्जनलब्धविश्रामाः शीतोष्णवर्षपवनविष्टम्भवि-भिन्नसर्वत्वचो विविधनियमोपयोगचर्यानुष्ठानविहि-तपरिशुष्कमांसशोणितत्वगस्थिभूता धृतिपराः सत्त्व-योगाच्छरीराण्युद्वहन्ते ॥ १ ॥
भृगुजी कहते हैं—मुने! तीसरे आश्रम वानप्रस्थका पालन करनेवाले मनुष्य धर्मका अनुसरण करते हुए पवित्र तीर्थोंमें, नदियोंके किनारे, झरनोंके आसपास तथा मृग, भैंसे, सूअर, सिंह एवं जंगली हाथियोंसे भरे हुए एकान्त वनोंमें तप करते हुए विचरते रहते हैं। गृहस्थोंके उपभोगमें आनेवाले ग्रामजनोचित सुन्दर वस्त्र, स्वादिष्ट भोजन और विषयभोगोंका परित्याग करके वे जंगलमें अपने-आप होनेवाले अन्न, फल, मूल तथा पत्तोंका परिमित, विचित्र एवं नियत आहार करते हैं। भूमिपर ही बैठते हैं। जमीन, पत्थर, रेत, कँकरीली मिट्टी, बालू अथवा राखपर ही सोते हैं। काश, कुश, मृगचर्म और वृक्षोंकी छालसे बने वस्त्रोंसे अपना शरीर ढकते हैं। सिरके बाल, दाढ़ी, मूँछ, नख और रोम सदा धारण किये रहते हैं। नियत समयपर स्नान करके निश्चित कालका उल्लंघन न करते हुए बलिवैश्वदेव तथा अग्निहोत्र आदि कर्मोंका अनुष्ठान करते हैं। सबेरे हवन-पूजनके लिये समिधा, कुशा और फूल आदिका संग्रह करके आश्रमको झाड़-बुहार लेनेके पश्चात् उन्हें कुछ विश्राम मिलता है। सर्दी गर्मी, वर्षा और हवाका वेग सहते-सहते उनके शरीरके चमड़े फट जाते हैं। नाना प्रकारके नियमोंका पालन और सत्कर्मोंका अनुष्ठान करते रहनेसे उनके रक्त और मांस सूख जाते हैं और शरीरकी जगह चामसे ढँकी हुई हड्डियोंका ढाँचामात्र रह जाता है; फिर भी धैर्य रखकर साहसपूर्वक शरीरका भार ढोते रहते हैं ॥ १ ॥
यस्त्वेतां नियतश्चर्यां ब्रह्मर्षिविहितां चरेत् स दहेदग्निवद्दोषाञ् जयेल्लोकांश्च दुर्जयान् ॥ २ ॥
जो पुरुष नियमके साथ रहकर ब्रह्मर्षियोंद्वारा आचरणमें लायी हुई इस वानप्रस्थ धर्मकी विधिका अनुष्ठान करता है, वह अग्निकी भाँति अपने दोषोंको भस्म करके दुर्लभ लोकोंको प्राप्त कर लेता है ॥ २ ॥
परिव्राजकानां पुनराचारः—तद्यथा विमुच्याग्नि-धनकलत्रपरिबर्हणं संगेष्वात्मनः स्नेहपाशानवधूय परिव्रजन्ति । समलोष्टाश्मकाञ्चनास्त्रिवर्गप्रवृत्तेष्व-सक्तबुद्धयोऽरिमित्रोदासीनानां तुल्यदर्शनाः स्थावर-जरायुजाण्डजस्वेदजोद्भिज्जानां भूतानां वाङ्मनः-कर्मभिरनभिद्रोहिणोऽनिकेताः पर्वतपुलिनवृक्षमूल देवतायतनान्यनुचरन्तो वासार्थमुपेयुर्नगरं ग्रामं वा नगरे पञ्चरात्रिकाः ग्रामे चैकरात्रिकाः प्रविश्य च प्राणधारणार्थं द्विजातीनां भवनान्यसंकीर्णकर्मणामुपतिष्ठेयुः पात्रपतितायाचितभैक्ष्याः कामक्रोधदर्प-लोभमोहकार्पण्यदम्भपरिवादाभिमानहिंसानिवृत्ता इति ॥ ३ ॥
अब संन्यासियोंका आचरण बतलाया जाता है। वह इस प्रकार है—इसमें प्रवेश करनेवाले पुरुष अग्निहोत्र, धन, स्त्री आदि परिवार तथा घरकी सारी सामग्रीका परित्याग करके भोगों और संगोंके प्रति अपनी आसक्तिके बन्धनोंको तोड़कर सदाके लिये घरसे बाहर निकल जाते हैं। ढेले, पत्थर और सुवर्णको समान समझते हैं। धर्म, अर्थ और कामसम्बन्धी प्रवृत्तियोंमें उनकी बुद्धि आसक्त नहीं होती। शत्रु, मित्र और उदासीन—सबके प्रति वे समान दृष्टि रखते हैं। स्थावर, पिण्डज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज प्राणियोंके प्रति मन, वाणी और क्रियाओंद्वारा कभी द्रोह नहीं करते हैं, कुटी या मठ बनाकर नहीं रहते हैं। उन्हें चाहिये कि चारों ओर विचरते रहें तथा रात्रिमें ठहरनेके लिये पर्वतकी गुफा, नदीका किनारा, वृक्षकी जड़, देवमन्दिर, नगर अथवा गाँवमें चले जाया करें। नगरमें पाँच रात्रि और गाँवमें एक रातसे अधिक न ठहरें। प्राणधारणके लिये अपने विशुद्ध धर्मोंका पालन करनेवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इन द्विजातियोंके ऐसे घरोंपर जाकर खड़े हो जायँ, जहाँ संकीर्णता न हो। बिना माँगे ही पात्रमें जितनी भिक्षा आ जाय, उतनी ही स्वीकार करें। काम, क्रोध, दर्प, लोभ, मोह, कृपणता, दम्भ, निन्दा, अभिमान तथा हिंसासे सर्वथा दूर रहें ॥ ३ ॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा यश्चरते मुनिः ।
न तस्य सर्वभूतेभ्यो भयमुत्पद्यते क्वचित् ॥ ४ ॥
इस विषयमें ये श्लोक प्रसिद्ध हैं—
जो मुनि सब प्राणियोंको अभयदान देकर विचरता है, उसको सम्पूर्ण प्राणियोंमें किसीसे भी कहीं भय नहीं प्राप्त होता है ॥ ४ ॥
कृत्वाग्निहोत्रं स्वशरीरसंस्थं
शारीरमग्निं स्वमुखे जुहोति ।
विप्रस्तु भैक्ष्योपगतैर्हविर्भि- श्चिताग्निनां स व्रजते हि लोकम् ॥ ५ ॥ जो ब्राह्मण अग्निहोत्रको अपने शरीरमें आरोपित करके शरीरस्थ अग्निके उद्देश्यसे अपने मुखमें प्राप्त भिक्षारूप हविष्यका होम करता है, वह अग्नि-चयन करनेवाले अग्निहोत्रियोंके लोकमें जाता है ॥ ५ ॥
मोक्षाश्रमं यश्चरते यथोक्तं शुचिः सुसंकल्पितमुक्तबुद्धिः । अनिन्धनं ज्योतिरिव प्रशान्तं स ब्रह्मलोकं श्रयते मनुष्यः ॥ ६ ॥ जो बुद्धिको संकल्परहित करके पवित्र हो शास्त्रोक्त विधिके अनुसार मोक्ष-आश्रम (संन्यास) के नियमोंका पालन करता है, वह मनुष्य बिना ईंधनकी आगके समान परम शान्त ज्योतिर्मय ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है ॥ ६ ॥
भरद्वाज उवाच
अस्माल्लोकात् परो लोकः श्रूयते नोपलभ्यते । तमहं ज्ञातुमिच्छामि तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ ७ ॥ भरद्वाजने पूछा—ब्रह्मन्! इस लोकसे कोई श्रेष्ठ लोक सुना जाता है; किंतु वह देखनेमें नहीं आता। मैं उसे जानना चाहता हूँ, आप उसे बतानेकी कृपा करें ॥ ७ ॥
भृगुरुवाच
उत्तरे हिमवत्पार्श्वे पुण्ये सर्वगुणान्विते । पुण्यः क्षेम्यश्च काम्यश्च स परो लोक उच्यते ॥ ८ ॥ भृगुजीने कहा—मुने! उत्तरदिशामें हिमालयके पार्श्वभागमें, जो सर्वगुणसम्पन्न एवं पुण्यमय प्रदेश है, वहाँके भू-भागपर श्रेष्ठ लोक बताया जाता है, वह पवित्र, कल्याणकारी और कमनीय लोक है ॥ ८ ॥
तत्र ह्यापापकर्माणः शुचयोऽत्यन्तनिर्मलाः । लोभमोहपरित्यक्ता मानवा निरुपद्रवाः ॥ ९ ॥ वहाँ पापकर्मसे रहित, पवित्र, अत्यन्त निर्मल, लोभ और मोहसे शून्य तथा सब प्रकारके उपद्रवोंसे रहित मानव निवास करते हैं ॥ ९ ॥
स स्वर्गसदृशो देशस्तत्र ह्युक्ताः शुभा गुणाः । काले मृत्युः प्रभवति स्पृशन्ति व्याधयो न च ॥ १० ॥ वह देश स्वर्गके तुल्य है। वहाँ सभी शुभ गुणोंकी स्थिति बतायी गयी है। वहाँ समयपर ही मृत्यु होती है। रोग-व्याधि किसीका स्पर्श नहीं करते हैं ॥ १० ॥
न लोभः परदारेषु स्वदारनिरतो जनः ।
नान्योन्यं बध्यते तत्र द्रव्येषु च न विस्मयः । परो ह्यधर्मो नैवास्ति संदेहो नापि जायते ॥ ११ ॥ वहाँ किसीके मनमें परायी स्त्रियोंके प्रति लोभ नहीं होता। सब लोग अपनी ही स्त्रियोंमें अनुरक्त रहते हैं। वहाँके निवासी धनके लिये एक दूसरेका वध नहीं करते। किसीको बन्धनमें नहीं डालते। उन्हें कभी महान् विस्मय नहीं होता। अधर्मका तो वहाँ नाम भी नहीं है। वहाँ किसीके मनमें संदेह नहीं पैदा होता है ॥ ११ ॥
कृतस्य तु फलं तत्र प्रत्यक्षमुपलभ्यते । पानासनाशनोपेताः प्रासादभवनाश्रयाः ॥ १२ ॥ सर्वकामैर्वृताः केचिद्धेमाभरणभूषिताः । प्राणधारणमात्रं तु केषांचिदुपपद्यते । श्रमेण महता केचित् कुर्वन्ति प्राणधारणम् ॥ १३ ॥ वहाँ किये हुए कर्मका फल प्रत्यक्ष उपलब्ध होता है। उस लोकमें कुछ लोग बड़े-बड़े महलोंमें रहते, अच्छे आसनोंपर बैठते और उत्तमोत्तम वस्तुएँ खाते-पीते हैं। समस्त कामनाओंसे सम्पन्न और सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित होते हैं तथा कुछ लोगोंको प्राणधारणमात्रके लिये भोजन प्राप्त होता है, कुछ लोग बड़े परिश्रमसे तपोमय जीवन व्यतीत करते हुए प्राण धारण करते हैं (इस प्रकार वह लोक इस लोकसे सर्वथा उत्कृष्ट है)* ॥ १२-१३ ॥
इह धर्मपराः केचित् केचिन्नैकृतिका नराः । सुखिता दुःखिताः केचिन्निर्धना धनिनोऽपरे ॥ १४ ॥ इस मनुष्यलोकमें कुछ मनुष्य धर्मपरायण होते हैं तो कुछ बड़े भारी ठग निकलते हैं। इसीलिये कोई सुखी और कोई दुखी होते हैं। कुछ धनवान् और कुछ लोग निर्धन हो जाते हैं ॥ १४ ॥
इह श्रमो भयं मोहः क्षुधा तीव्रा च जायते । लोभश्चार्थकृतो नृणां येन मुह्यन्त्यपण्डिताः ॥ १५ ॥ इहलोकमें श्रम, भय, मोह और तीव्र भूखका कष्ट होता है। मनुष्योंमें धनका लोभ विशेष होता है, जिससे अज्ञानी पुरुष मोहमें पड़ जाते हैं ॥ १५ ॥
इह वार्ता बहुविधा धर्माधर्मस्य कारिणः । यस्तद्भेदोभयं प्राज्ञः पाप्मना न स लिप्यते ॥ १६ ॥ इस देशमें धर्म और अधर्म करनेवाले मनुष्योंके विषयमें नाना प्रकारकी बातें सुनी जाती हैं। जो धर्म और अधर्म दोनोंके परिणामको जानता है, वह विद्वान् पुरुष पापसे लिप्त नहीं होता है ॥ १६ ॥
सोपधं निकृतिः स्तेयं परिवादो ह्यसूयिता । परोपघातो हिंसा च पैशुन्यमनृतं तथा ॥ १७ ॥
एतानासेवते यस्तु तपस्तस्य प्रहीयते । यस्त्वेतान् नाचरेद् विद्वांस्तपस्तस्य प्रवर्धते ॥ १८ ॥ कपट, शठता, चोरी, निन्दा, दूसरोंके दोष देखना, दूसरोंको हानि पहुँचाना, प्राणियोंकी हिंसा करना, चुगली खाना और झूठ बोलना—जो इन दुर्गुणोंका सेवन करता है, उसकी तपस्या क्षीण होती है और जो विद्वान् इन दोषोंको कभी अपने आचरणमें नहीं लाता, उसकी तपस्या निरन्तर बढ़ती रहती है ॥ १७-१८ ॥
इह चिन्ता बहुविधा धर्माधर्मस्य कर्मणः । कर्मभूमिरियं लोके इह कृत्वा शुभाशुभम् । शुभैः शुभमवाप्नोति तथाशुभमथान्यथा ॥ १९ ॥ इस लोकमें पुण्य और पापकर्मके सम्बन्धमें अनेक प्रकारके विचार होते रहते हैं। यह कर्मभूमि है। इस जगत्में शुभ और अशुभ कर्म करके मनुष्य शुभ कर्मोंका शुभ फल पाता है और अशुभ कर्मोंका अशुभ फल भोगता है ॥ १९ ॥
इह प्रजापतिः पूर्वं देवाः सर्षिगणास्तथा । इष्ट्वेष्टतपसः पूता ब्रह्मलोकमुपाश्रिताः ॥ २० ॥ पूर्वकालमें यहीं प्रजापति, देवता तथा ऋषियोंने यज्ञ और अभीष्ट तपस्या करके पवित्र हो ब्रह्मलोकको प्राप्त कर लिया ॥ २० ॥
उत्तरः पृथिवीभागः सर्वपुण्यतमः शुभः । इहस्थास्तत्र जायन्ते ये वै पुण्यकृतो जनाः ॥ २१ ॥ पृथ्वीका उत्तरभाग सबसे अधिक पवित्र और मंगलमय है। इस लोकमें जो पुण्यात्मा मनुष्य हैं, वे ही मृत्युके पश्चात् उस भूभागमें जन्म लेते हैं ॥ २१ ॥
असत्कर्माणि कुर्वन्तस्तिर्यग्योनिषु चापरे । क्षीणायुषस्तथा चान्ये नश्यन्ति पृथिवीतले ॥ २२ ॥ दूसरे लोग जो यहाँ पापकर्म करते हैं, वे पशु-पक्षियोंकी योनिमें जन्म ग्रहण करते हैं और दूसरे कितने ही आयुक्षय होनेपर नष्ट हो जाते हैं और पातालमें चले जाते हैं ॥ २२ ॥
अन्योन्यभक्षणासक्ता लोभमोहसमन्विताः । इहैव परिवर्तन्ते न ते यान्त्युत्तरां दिशम् ॥ २३ ॥ जो लोभ और मोहसे युक्त हो एक दूसरेको खा जानेके लिये उद्यत रहते हैं, वे भी इसी लोकमें आवागमन करते रहते हैं, उत्तरदिशाके उत्कृष्ट लोकमें नहीं जाने पाते हैं ॥
ये गुरून् पर्युपासन्ते नियता ब्रह्मचारिणः । पन्थानं सर्वलोकानां विजानन्ति मनीषिणः ॥ २४ ॥ जो मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए गुरुजनोंकी उपासना करते हैं, वे मनीषी पुरुष सभी लोकोंके मार्गको जानते हैं ॥ २४ ॥
इत्युक्तोऽयं मया धर्मः संक्षिप्तो ब्रह्मनिर्मितः ।
धर्माधर्मौ हि लोकस्य यो वै वेत्ति स बुद्धिमान् ॥ २५ ॥
इस प्रकार मैंने यहाँ ब्रह्माजीके द्वारा निर्मित इस धर्मका संक्षेपसे वर्णन किया है। जो लोकमें करने और न करने योग्य धर्म और अधर्मको जानता है, वही बुद्धिमान् है ॥ २५ ॥
भीष्म उवाच
इत्युक्तो भृगुणा राजन् भरद्वाजः प्रतापवान् ।
भृगुं परमधर्मात्मा विस्मितः प्रत्यपूजयत् ॥ २६ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! भृगुजीके इस प्रकार कहनेपर परम धर्मात्मा प्रतापी भरद्वाजने आश्चर्यचकित होकर उनकी पूजा की ॥ २६ ॥
एष ते प्रसवो राजन् जगतः सम्प्रकीर्तितः ।
निखिलेन महाप्राज्ञ किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ २७ ॥
परम बुद्धिमान् नरेश! इस प्रकार मैंने तुमसे जगत्की उत्पत्तिके सम्बन्धमें ये सारी बातें बतायी हैं। अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि भृगुभरद्वाजसंवादे
द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें भृगु-भरद्वाजसंवादविषयक एक सौ बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९२ ॥
* आचार्य नीलकण्ठने 'उत्तरे हिमवत्पार्श्वे' इत्यादिसे लेकर इस अध्यायके अन्ततकके श्लोकोंका आध्यात्मिक अर्थ किया है। वे परलोक या उत्कृष्ट लोकका अर्थ परमात्मा मानते हैं और इसी दृष्टिसे उन्होंने श्रुति और युक्तिका आश्रय ले पूरे प्रकरणकी संगति लगायी है।
शिष्टाचारका फलसहित वर्णन, पापको छिपानेसे हानि और धर्मकी प्रशंसा
त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्यायः
शिष्टाचारका फलसहित वर्णन, पापको छिपानेसे हानि और धर्मकी प्रशंसा
युधिष्ठिर उवाच
आचारस्य विधिं तात प्रोच्यमानं त्वयानघ ।
श्रोतुमिच्छामि धर्मज्ञ सर्वज्ञो ह्यसि मे मतः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— धर्मज्ञ पितामह! अब मैं आपके मुखसे सदाचारकी विधि सुनना चाहता हूँ; क्योंकि आप सर्वज्ञ हैं ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
दुराचारा दुर्विचेष्टा दुष्प्रज्ञाः प्रियसाहसाः ।
असंतस्त्विति विख्याताः संतश्चाचारलक्षणाः ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! जो दुराचारी, बुरी चेष्टावाले, दुर्बुद्धि और दुःसाहसको प्रिय माननेवाले हैं, वे दुष्टात्माके नामसे विख्यात होते हैं। श्रेष्ठ पुरुष तो वही हैं, जिनमें सदाचार देखा जाय—सदाचार ही उनका लक्षण है ॥ २ ॥
पुरीषं यदि वा मूत्रं ये न कुर्वन्ति मानवाः ।
राजमार्गे गवां मध्ये धान्यमध्ये च ते शुभाः ॥ ३ ॥
जो मनुष्य सड़कपर, गौओंके बीचमें और अनाजमें मल या मूत्रका त्याग नहीं करते हैं, वे श्रेष्ठ समझे जाते हैं ॥ ३ ॥
शौचमावश्यकं कृत्वा देवतानां च तर्पणम् ।
धर्ममाहुर्मनुष्याणामुपस्पृश्य नदीं तरेत् ॥ ४ ॥
प्रतिदिन आवश्यक शौचका सम्पादन करके आचमन करे; फिर नदीमें नहाये और अपने अधिकारके अनुसार संध्योपासनाके अनन्तर देवता आदिका तर्पण करे। इसे विद्वान् पुरुष मानवमात्रका धर्म बताते हैं ॥ ४ ॥
सूर्य सदोपतिष्ठेत न च सूर्योदये स्वपेत् ।
सायं प्रातर्जपेत् संध्यां तिष्ठन् पूर्वां तथेतराम् ॥ ५ ॥
नित्यप्रति सूर्योपस्थान करे। सूर्योदयके समय कभी न सोये। सायंकाल और प्रातःकाल दोनों समय संध्योपासना करके गायत्रीमन्त्रका जप करे ॥ ५ ॥
पञ्चार्द्रो भोजनं भुञ्ज्यात् प्राङ्मुखो मौनमास्थितः ।
न निन्द्यादन्नभक्ष्यांश्च स्वाद्वस्वादु च भक्षयेत् ॥ ६ ॥
दोनों हाथ, दोनों पैर और मुँह—इन पाँच अंगोंको धोकर* पूर्वाभिमुख हो भोजन करे। भोजनके समय मौन रहे। परोसे हुए अन्नकी निन्दा न करे। वह स्वादिष्ट हो या न हो, प्रेमसे भोजन कर ले ।। ६ ।। आर्द्रपाणिः समुत्तिष्ठेन्नार्द्रपादः स्वपेन्निशि । देवर्षिनारदः प्राह एतदाचारलक्षणम् ।। ७ ।। भोजनके बाद हाथ धोकर उठे। रातको भीगे पैर न सोये। देवर्षि नारद इसीको सदाचारका लक्षण कहते हैं ।। शुचिं देशमनड्वाहं देवगोष्ठं चतुष्पथम् । ब्राह्मणं धार्मिकं चैत्यं नित्यं कुर्यात् प्रदक्षिणम् ।। ८ ।। अतिथीनां च सर्वेषां प्रेष्याणां स्वजनस्य च । सामान्यं भोजनं भृत्यैः पुरुषस्य प्रशस्यते ।। ९ ।। यज्ञशाला आदि पवित्र स्थान, बैल, देवालय, चौराहा, ब्राह्मण, धर्मात्मा मनुष्य तथा चैत्य (देवसम्बन्धी वृक्ष)—इनको सदा दाहिने करके चले। गृहस्थ पुरुषको घरमें अतिथियों, सेवकों और स्वजनोंके लिये भी एक-सा भोजन बनवाना श्रेष्ठ माना गया है ।। ८-९ ।। सायं प्रातर्मनुष्याणामशनं वेदनिर्मितम् । नान्तरा भोजनं दृष्टमुपवासी तथा भवेत् ।। १० ।। शास्त्रमें मनुष्योंके लिये सायंकाल और प्रातःकाल दो ही समय भोजन करनेका विधान है। बीचमें भोजन करनेकी विधि नहीं देखी गयी है। जो इस नियमका पालन करता है, उसे उपवास करनेका फल प्राप्त होता है ।। १० ।। होमकाले तथा जुह्वन्नृतुकाले तथा व्रजन् । अनन्यस्त्रीजनः प्राज्ञो ब्रह्मचारी तथा भवेत् ।। ११ ।। जो होमके समय प्रतिदिन हवन करता, ऋतुकालमें स्त्रीके पास जाता और परायी स्त्रीपर कभी दृष्टि नहीं डालता, वह बुद्धिमान् पुरुष ब्रह्मचारीके समान माना जाता है ।। ११ ।। अमृतं ब्राह्मणोच्छिष्टं जनन्या हृदयं कृतम् । तज्जनाः पर्युपासन्ते सत्यं सन्तः समासते ।। १२ ।। ब्राह्मणको भोजन करानेके बाद बचा हुआ अन्न अमृत है। वह माताके स्तन्यकी भाँति हितकर है। उसको जो लोग सेवन करते हैं, वे श्रेष्ठ पुरुष सत्यस्वरूप परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेते हैं ।। १२ ।। लोष्टमर्दी तृणच्छेदी नखखादी तु यो नरः । नित्योच्छिष्टः शंकुशुको नेहायुर्विन्दते महत् ।। १३ ।। जो मनुष्य मिट्टीके ढेले फोड़ता, तिनके तोड़ता, नख चबाता, सदा जूठे हाथ और जूठे मुँह रहता है तथा खूँटीमें बँधे हुए तोतेके समान पराधीन जीवन बिताता है, उसे इस जगत्में
बड़ी आयु नहीं मिलती ॥ १३ ॥
यजुषा संस्कृतं मांसं निवृत्तो मांसभक्षणात् ।
न भक्षयेद् वृथामांसं पृष्ठमांसं च वर्जयेत् ॥ १४ ॥
जो मांस-भक्षण न करता हो, वह यजुर्वेदके मन्त्रोंद्वारा संस्कार किया हुआ मांस भी न खाय। व्यर्थ मांस और श्राद्धशेष मांस भी वह त्याग दे ॥ १४ ॥
स्वदेशे परदेशे वा अतिथिं नोपवासयेत् ।
काम्यकर्मफलं लब्ध्वा गुरूणामुपपादयेत् ॥ १५ ॥
मनुष्य स्वदेशमें हो या परदेशमें—अपने पास आये हुए अतिथिको भूखा न रहने दे। सकाम कर्तव्यकर्मोंके फलरूपमें प्राप्त पदार्थ अपने गुरुजनोंको निवेदित कर दे ॥ १५ ॥
गुरुभ्य आसनं देयं कर्तव्यं चाभिवादनम् ।
गुरूनभ्यर्च्य युज्यन्ते आयुषा यशसा श्रिया ॥ १६ ॥
गुरुजन पधारें तो उन्हें बैठनेके लिये आसन दे, प्रणाम करे, गुरुओंकी पूजा करनेसे मनुष्य आयु, यश और लक्ष्मीसे सम्पन्न होते हैं ॥ १६ ॥
नेक्षेतादित्यमुद्यन्तं न च नग्नां परस्त्रियम् ।
मैथुनं सततं धर्म्यं गुह्ये चैव समाचरेत् ॥ १७ ॥
उगते हुए सूर्यकी ओर न देखे, नंगी हुई परायी स्त्रीकी ओर दृष्टि न डाले और सदा धर्मानुसार ऋतुकालके समय अपनी ही पत्नीके साथ एकान्त स्थानमें समागम करे ॥ १७ ॥
तीर्थानां हृदयं तीर्थं शुचीनां हृदयं शुचिः ।
सर्वमार्यकृतं चौक्ष्यं वालसंस्पर्शनानि च ॥ १८ ॥
तीर्थोंमें श्रेष्ठ तीर्थ विशुद्ध हृदय है, पवित्र वस्तुओंमें अतिपवित्र भी विशुद्ध हृदय ही है। शिष्ट पुरुष जिसे आचरणमें लाते हैं, वह आचरण सर्वश्रेष्ठ है। चँवर आदिमें लगे हुए गायकी पूँछके बालोंका स्पर्श भी शिष्टाचारानुमोदित होनेके कारण शुद्ध है ॥ १८ ॥
दर्शने दर्शने नित्यं सुखप्रश्नमुदाहरेत् ।
सायं प्रातश्च विप्राणां प्रदिष्टमभिवादनम् ॥ १९ ॥
परिचित मनुष्यसे जब-जब भेंट हो, सदा उसका कुशल-समाचार पूछे। सायंकाल और प्रातःकाल दोनों समय ब्राह्मणोंको प्रणाम करे, यह शास्त्रकी आज्ञा है ॥ १९ ॥
देवागारे गवां मध्ये ब्राह्मणानां क्रियापथे ।
स्वाध्याये भोजने चैव दक्षिणं पाणिमुद्धरेत् ॥ २० ॥
देवमन्दिरमें, गौओंके बीचमें, ब्राह्मण के यज्ञादि कर्मोंमें, शास्त्रोंके स्वाध्यायकालमें और भोजन करते समय दाहिने हाथसे काम ले ॥ २० ॥
सायं प्रातश्च विप्राणां पूजनं च यथाविधि ।
पण्यानां शोभते पण्यं कृषीणां बाध्यते कृषिः ॥ २१ ॥
बहुकारं च सस्यानां वाह्यो वाहो गवां तथा। सबेरे और शाम दोनों समय विधिपूर्वक ब्राह्मणोंका पूजन (सेवा-सत्कार) करना चाहिये। यही व्यापारोंमें उत्तम व्यापारकी भाँति शोभा पाता है और यही खेतीमें सबसे अच्छी खेतीके समान प्रत्यक्ष फलदायक है। ब्राह्मणपूजक पुरुषके विविध अन्नोंकी वृद्धि होती है और उसे वाहनोंमें गोजातिके श्रेष्ठ वाहन सुलभ होते हैं।। २१ १/२ ।।
सम्पन्नं भोजने नित्यं पानीये तर्पणं तथा ।। २२ ।। सुशृतं पायसे ब्रूयाद् यवाग्वां कृसरे तथा। भोजन करानेके पश्चात् दाता पूछे कि क्या भोजन सम्पन्न हो गया? ब्राह्मण उत्तर दे कि सम्पन्न हो गया। इसी प्रकार जल पिलानेके बाद दाता पूछे तृप्ति हुई क्या? ब्राह्मण उत्तर दे कि अच्छी तरह तृप्ति हो गयी। खीर खिलानेके बाद जब यजमान पूछे कि अच्छा बना था न? तब ब्राह्मण उत्तर दे बहुत अच्छा बना था। इसी प्रकार जौका हलुआ और खिचड़ी खिलानेके बाद भी प्रश्न और उत्तर होना चाहिये ।। २२ १/२ ।।
श्मश्रुकर्मणि सम्प्राप्ते क्षुते स्नानेऽथ भोजने। व्याधितानां च सर्वेषामायुष्यमभिनन्दनम् ।। २३ ।। हजामत बनाने, छींकने, स्नान और भोजन करनेके बाद हरेक मनुष्यको तथा सभी अवस्थाओंमें सम्पूर्ण रोगियोंका कर्तव्य है कि वे ब्राह्मणोंको प्रणाम आदिसे प्रसन्न करें। इससे उनकी आयु बढ़ती है ।। २३ ।।
प्रत्यादित्यं न मेहेत न पश्येदात्मनः शकृत् । सह स्त्रियाथ शयनं सह भोज्यं च वर्जयेत् ।। २४ ।। सूर्यकी ओर मुँह करके पेशाब न करे। अपनी विष्ठापर दृष्टि न डाले। स्त्रीके साथ एक शय्यापर सोना और एक थालीमें भोजन करना छोड़ दे ।। २४ ।।
त्वंकारं नामधेयं च ज्येष्ठानां परिवर्जयेत् । अवराणां समानानामुभयेषां न दुष्यति ।। २५ ।। अपनेसे बड़ोंका नाम लेकर या तू कहकर न पुकारे, जो अपनेसे छोटे या समवयस्क हों, उनके लिये वैसा करना दोषकी बात नहीं है ।। २५ ।।
हृदयं पापवृत्तानां पापमाख्याति वैकृतम् । ज्ञानपूर्वं विनश्यन्ति गूहमाना महाजने ।। २६ ।। पापियोंका हृदय तथा उनके नेत्र और मुख आदिका विकार ही उनके पापोंको बता देता है। जो लोग जान-बूझकर किये हुए पापको महापुरुषोंसे छिपाते हैं, वे गिर जाते हैं ।। २६ ।।
ज्ञानपूर्वकृतं पापं छादयत्यबहुश्रुतः। नैनं मनुष्याः पश्यन्ति पश्यन्त्येव दिवौकसः ।। २७ ।।
मूर्ख मनुष्य ही जान-बूझकर किये हुए पापको छिपाता है। यद्यपि उस पापको मनुष्य नहीं देखते हैं, तो भी देवतालोग तो देखते ही हैं ॥ २७ ॥ पापेनापिहितं पापं पापमेवानुवर्तते । धर्मेणापिहितो धर्मो धर्ममेवानुवर्तते । धार्मिकेण कृतो धर्मो धर्ममेवानुवर्तते ॥ २८ ॥ पापी मनुष्यका पापके द्वारा छिपाया हुआ पाप पुनः उसे पापमें ही लगाता है और धर्मात्माका धर्मतः गुप्त रक्खा हुआ धर्म उसे पुनः धर्ममें ही प्रवृत्त करता है ॥ पापं कृतं न स्मरतीह मूढो विवर्तमानस्य तदेति कर्तुः । राहुर्यथा चन्द्रमुपैति चापि तथाबुधं पापमुपैति कर्म ॥ २९ ॥ मूर्ख मनुष्य अपने किये हुए पापको याद नहीं रखता; परंतु पापमें प्रवृत्त हुए कर्ताका पाप स्वयं ही उसके पीछे लगा रहता है, जैसे राहु चन्द्रमाके पास स्वतः पहुँच जाता है, उसी प्रकार उस मूढ़ मनुष्यके पास उसका पाप स्वयं चला जाता है ॥ २९ ॥ आशया संचितं द्रव्यं दुःखेनैवोपभुज्यते । तद् बुधा न प्रशंसन्ति मरणं न प्रतीक्षते ॥ ३० ॥ किसी विशेष कामनाकी पूर्तिकी आशासे जो धन संचित करके रखा गया है, उसका उपभोग दुःखपूर्वक ही किया जाता है; अतः विद्वान् पुरुष उसकी प्रशंसा नहीं करते हैं; क्योंकि मृत्यु किसीकी कामना-पूर्तिके अवसरकी प्रतीक्षा नहीं करती है ॥ ३० ॥ मानसं सर्वभूतानां धर्ममाहुर्मनीषिणः । तस्मात् सर्वेषु भूतेषु मनसा शिवमाचरेत् ॥ ३१ ॥ मनीषी पुरुषोंका कथन है कि समस्त प्राणियोंके लिये मनद्वारा किया हुआ धर्म ही श्रेष्ठ है; अतः मनसे सम्पूर्ण जीवोंका कल्याण सोचता रहे ॥ ३१ ॥ एक एव चरेद् धर्मं नास्ति धर्मे सहायता । केवलं विधिमासाद्य सहायः किं करिष्यति ॥ ३२ ॥ केवल वेदविधिका सहारा लेकर अकेले ही धर्मका आचरण करना चाहिये। उसमें सहायताकी आवश्यकता नहीं है। कोई दूसरा सहायक आकर क्या करेगा ॥ ३२ ॥ धर्मो योनिर्मनुष्याणां देवानाममृतं दिवि । प्रेत्यभावे सुखं धर्माच्छश्वत्तैरुपभुज्यते ॥ ३३ ॥ धर्म ही मनुष्योंकी योनि है। वही स्वर्गमें देवताओंका अमृत है। धर्मात्मा मनुष्य मरनेके पश्चात् धर्मके ही बलसे सदा सुख भोगते हैं ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि भीष्मयुधिष्ठिर संवादे आचारविधौ त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें भीष्म-युधिष्ठिरसंवादके प्रसंगमें आचारविधिविषयक एक सौ तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९३ ॥
* तात्पर्य यह कि भोजनके लिये जाते समय तत्काल हाथ, पैर और मुँह धोने चाहिये। बहुत पहलेके धोये हों, तो भी उस समय धो लेना आवश्यक है।
१९४-
चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्यायः
अध्यात्मज्ञानका निरूपण
युधिष्ठिर उवाच
अध्यात्मं नाम यदिदं पुरुषस्येह चिन्त्यते ।
यदध्यात्मं यथा चैतत् तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! शास्त्रोंमें मनुष्यके लिये अध्यात्मके नामसे जिसका विचार किया जाता है, वह अध्यात्मज्ञान क्या है और कैसा है? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥
कुतः सृष्टमिदं विश्वं ब्रह्मन् स्थावरजङ्गमम् ।
प्रलये कथमभ्येति तन्मे वक्तुमिहार्हसि ॥ २ ॥
ब्रह्मन्! इस चराचर जगत्की सृष्टि किससे हुई है और प्रलयकालमें इसका लय किस प्रकार होता है; इस विषयका मुझसे वर्णन कीजिये ॥ २ ॥
भीष्म उवाच
अध्यात्ममिति मां पार्थ यदेतदनुपृच्छसि ।
तद् व्याख्यास्यामि ते तात श्रेयस्करतमं सुखम् ॥ ३ ॥
**भीष्मजीने कहा—**तात! कुन्तीनन्दन! तुम जिस अध्यात्मज्ञानके विषयमें पूछ रहे हो, उसकी व्याख्या मैं तुम्हारे लिये करता हूँ; वह परम कल्याणकारी और सुखस्वरूप है ॥ ३ ॥
सृष्टिप्रलयसंयुक्तमाचार्यैः परिदर्शितम् ।
यज्ज्ञात्वा पुरुषो लोके प्रीतिं सौख्यं च विन्दति ।
फललाभश्च तस्य स्यात् सर्वभूतहितं च तत् ॥ ४ ॥
आचार्योंने सृष्टि और प्रलयकी व्याख्याके साथ अध्यात्मज्ञानका विवेचन किया है, जिसे जानकर मनुष्य इस संसारमें सुख और प्रसन्नताका भागी होता है। उसे अभीष्ट फलकी प्राप्ति भी होती है। वह अध्यात्मज्ञान समस्त प्राणियोंके लिये हितकर है ॥ ४ ॥
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् ।
महाभूतानि भूतानां सर्वेषां प्रभवाप्ययौ ॥ ५ ॥
पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और अग्नि—ये पाँच महाभूत सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हैं ॥ ५ ॥
यतः सृष्टानि तत्रैव तानि यान्ति पुनः पुनः ।
महाभूतानि भूतेभ्यः सागरस्योर्मयो यथा ॥ ६ ॥
जैसे लहरें समुद्रसे प्रकट होकर फिर उसीमें लीन हो जाती हैं, उसी प्रकार ये पाँच महाभूत भी जिस परमात्मासे उत्पन्न हुए हैं, उसीमें सब प्राणियोंके सहित बारंबार लीन होते हैं॥ ६॥
प्रसार्य च यथाङ्गानि कूर्मः संहरते पुनः।
तद्वद् भूतानि भूतात्मा सृष्टानि हरते पुनः॥ ७॥
जैसे कछुआ अपने अंगोंको फैलाकर पुनः समेट लेता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा परब्रह्म परमेश्वर अपने रचे हुए सम्पूर्ण भूतोंको फैलाकर फिर अपने भीतर ही समेट लेते हैं॥ ७॥
महाभूतानि पञ्चैव सर्वभूतेषु भूतकृत्।
अकरोत् तेषु वैषम्यं तत्तु जीवो न पश्यति॥ ८॥
सम्पूर्ण भूतोंकी सृष्टि करनेवाले परमात्माने सब प्राणियोंके शरीरोंमें पाँच ही महाभूतोंको स्थापित किया है; परंतु उनमें विषमता कर दी है—किसी महाभूतके अंशको अधिक और किसीके अंशको कम करके रखा है। उस वैषम्यको साधारण जीव नहीं देख पाता॥ ८॥
शब्दः श्रोत्रं तथा खानि त्रयमाकाशयोनिजम्।
वायोः स्पर्शस्तथा चेष्टा त्वक् चैव त्रितयं स्मृतम्॥ ९॥
शब्दगुण, श्रोत्र इन्द्रिय और शरीरके सम्पूर्ण छिद्र—ये तीन आकाशके कार्य हैं। स्पर्श, चेष्टा और त्वगिन्द्रिय—ये तीन वायुके कार्य माने गये हैं॥ ९॥
रूपं चक्षुस्तथा पाकस्त्रिविधं तेज उच्यते।
रसः क्लेदश्च जिह्वा च त्रयो जलगुणाः स्मृताः॥ १०॥
रूप, नेत्र और परिपाक—ये तीन तेजके कार्य बताये जाते हैं। रस, जिह्वा तथा क्लेद (गीलापन)—ये तीन जलके गुण अर्थात् कार्य माने गये हैं॥ १०॥
घ्रेयं घ्राणं शरीरं च एते भूमिगुणास्त्रयः।
महाभूतानि पञ्चैव षष्ठं च मन उच्यते॥ ११॥
गन्ध, घ्राणेन्द्रिय और शरीर—ये तीन भूमिके गुण अर्थात् कार्य हैं। इस प्रकार इस शरीरमें पाँच महाभूत और छठा मन है; ऐसा बताया जाता है॥ ११॥
इन्द्रियाणि मनश्चैव विज्ञानान्यस्य भारत।
सप्तमी बुद्धिरित्याहुः क्षेत्रज्ञः पुनरष्टमः॥ १२॥
भरतनन्दन! श्रोत्र आदि पाँच इन्द्रियाँ और मन—ये जीवात्माको विषयोंका ज्ञान करानेवाले हैं। शरीरमें इन छः के अतिरिक्त सातवीं बुद्धि और आठवाँ क्षेत्रज्ञ है॥
चक्षुरालोचनायैव संशयं कुरुते मनः।
बुद्धिरध्यवसानाय क्षेत्रज्ञः साक्षिवत् स्थितः॥ १३॥
इन्द्रियाँ विषयोंको ग्रहण कराती हैं। मन संकल्प-विकल्प करता है। बुद्धि निश्चय करानेवाली है और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) साक्षीकी भाँति स्थित रहता है ॥ १३ ॥
ऊर्ध्वं पादतलाभ्यां यदर्वाक्चोध्वं च पश्यति।
एतेन सर्वमेवेदं विद्ध्यभिव्याप्तमन्तरम् ॥ १४ ॥
दोनों पैरोंके तलोंसे लेकर ऊपरतक जो शरीर स्थित है, उसे जो साक्षीभूत चेतन ऊपर-नीचे सब ओरसे देखता है, वह इस सारे शरीरके भीतर और बाहर सब जगह व्याप्त है। इस बातको तुम अच्छी तरह समझ लो ॥ १४ ॥
पुरुषैरिन्द्रियाणीह वेदितव्यानि कृत्स्नशः।
तमो रजश्च सत्त्वं च तेऽपि भावास्तदाश्रिताः ॥ १५ ॥
सभी मनुष्योंको अपनी इन्द्रियों (और मन-बुद्धि) की देख-भाल करके उनके विषयमें पूरी जानकारी रखनी चाहिये; क्योंकि सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण उन्हींका आश्रय लेकर रहते हैं ॥ १५ ॥
एतां बुद्ध्वा नरो बुद्ध्या भूतानामागतिं गतिम्।
समवेक्ष्य शनैश्चैव लभते शममुत्तमम् ॥ १६ ॥
मनुष्य अपनी बुद्धिके बलसे इन सबको और जीवोंके आवागमनकी अवस्थाको जानकर शनैः-शनैः उसपर विचार करनेसे उत्तम शान्ति पा जाता है ॥ १६ ॥
गुणैर्नेनीयते बुद्धिर्बुद्धेरेवेन्द्रियाण्यपि।
मनःषष्ठानि सर्वाणि तदभावे कुतो गुणाः ॥ १७ ॥
तम आदि गुण बुद्धिको बारंबार विषयोंकी ओर ले जाते हैं; तथा बुद्धिके साथ-साथ मनसहित पाँचों इन्द्रियोंको और उनकी समस्त वृत्तियोंको भी ले जाते हैं। उस बुद्धिके अभावमें गुण कैसे रह सकते हैं? ॥
इति तन्मयमेवैतत् सर्वं स्थावरजङ्गमम्।
प्रलीयते चोद्भवति तस्मान्निर्द्दिश्यते तथा ॥ १८ ॥
यह चराचर जगत् बुद्धिके उदय होनेपर ही उत्पन्न होता है और उसके लयके साथ ही लीन हो जाता है; इसलिये यह सारा प्रपंच बुद्धिमय ही है; अतएव श्रुतिने सबकी बुद्धिरूपताका ही निर्देश किया है ॥
येन पश्यति तच्चक्षुः शृणोति श्रोत्रमुच्यते।
जिघ्रति घ्राणमित्याहू रसं जानाति जिह्वया ॥ १९ ॥
बुद्धि जिसके द्वारा देखती है, उसे नेत्र और जिसके द्वारा सुनती है, उसे श्रोत्र कहते हैं। इसी प्रकार जिससे वह सूँघती है, उसे घ्राण कहा गया है, वही जिह्वाके द्वारा रसका अनुभव करती है ॥ १९ ॥
त्वचा स्पर्शयते स्पर्शं बुद्धिर्विक्रियतेऽसकृत्।
येन प्रार्थयते किञ्चित् तदा भवति तन्मनः ॥ २० ॥
बुद्धि त्वचासे स्पर्शका बोध प्राप्त करती है। इस प्रकार वह बारंबार विकारको प्राप्त होती रहती है। वह जिस करणके द्वारा जिसका अनुभव करना चाहती है, मन उसीका रूप धारण कर लेता है ॥ २० ॥ अधिष्ठानानि बुद्धेर्हि पृथगर्थानि पञ्चधा । इन्द्रियाणीति यान्याहुस्तान्यदृश्योऽधितिष्ठति ॥ २१ ॥ भिन्न-भिन्न विषयोंको ग्रहण करनेके लिये जो बुद्धिके पाँच अधिष्ठान हैं, उन्हींको पाँच इन्द्रियाँ कहते हैं। अदृश्य जीवात्मा उन सबका अधिष्ठाता (प्रेरक) है ॥ २१ ॥ पुरुषे तिष्ठती बुद्धिस्त्रिषु भावेषु वर्तते । कदाचिल्लभते प्रीतिं कदाचिदनुशोचति ॥ २२ ॥ न सुखेन न दुःखेन कदाचिदपि वर्तते । जीवात्माके आश्रित रहकर बुद्धि (सुख, दुःख और मोह) तीन भावोंमें स्थित होती है। वह कभी तो प्रसन्नताका अनुभव करती है, कभी शोकमें डूबी रहती है और कभी सुख और दुःख दोनोंके अनुभवसे रहित मोहाच्छन्न हो जाती है ॥ २२ १/२ ॥ एवं नराणां मनसि त्रिषु भावेष्ववस्थिता ॥ २३ ॥ सेयं भावात्मिका भावांस्त्रीनेतानतिवर्तते । सरितां सागरो भर्ता महावेलामिवोर्मिमान् ॥ २४ ॥ इस प्रकार वह मनुष्योंके मनके भीतर तीन भावोंमें अवस्थित है, यह भावात्मिका बुद्धि (समाधि-अवस्थामें) सुख, दुःख और मोह—इन तीनों भावोंको लाँघ जाती है। ठीक उसी तरह जैसे सरिताओंका स्वामी समुद्र उत्ताल तरंगोंसे संयुक्त हो अपनी विशाल तटभूमिको भी कभी-कभी लाँघ जाता है ॥ २३-२४ ॥ अतिभावगता बुद्धिर्भावे मनसि वर्तते । प्रवर्तमानं तु रजस्तद्भावमनुवर्तते ॥ २५ ॥ उपर्युक्त भावोंको लाँघ जानेपर भी बुद्धि भावात्मक मनमें सूक्ष्मरूपसे स्थित रहती है। तत्पश्चात् समाधिसे उत्थानके समय प्रवृत्त्यात्मक रजोगुण बुद्धिभावका अनुसरण करता है ॥ २५ ॥ इन्द्रियाणि हि सर्वाणि प्रवर्तयति सा तदा । ततः सत्त्वं तमोभावः प्रीतियोगात् प्रवर्तते ॥ २६ ॥ उस समय रजोगुणसे युक्त हुई बुद्धि सारी इन्द्रियोंको प्रवृत्तिमें लगा देती है। तदनन्तर विषयोंके सम्बन्धसे प्रीतिरूप सत्त्वगुण प्रकट होता है। उसके बाद पुरुषके आसक्ति आदि दोषोंसे तमोमय भावका उदय होता है ॥ २६ ॥ प्रीतिः सत्त्वं रजः शोकस्तमो मोहस्तु ते त्रयः । ये ये च भावा लोकेऽस्मिन् सर्वेष्वेतेषु वै त्रिषु ॥ २७ ॥
प्रसन्नता या हर्ष सत्त्वगुणका कार्य है, शोक रजोगुणरूप है और मोह तमोगुणरूप। इस संसारमें जो-जो भाव हैं, वे सब इन्हीं तीनोंके अन्तर्गत हैं॥ २७॥
इति बुद्धिगतिः सर्वा व्याख्याता तव भारत।
इन्द्रियाणि च सर्वाणि विजेतव्यानि धीमता ॥ २८ ॥
भारत! इस प्रकार मैंने तुम्हारे समक्ष बुद्धिकी सम्पूर्ण गतिका विशद विवेचन किया है। बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियोंको काबूमें रखे ॥
सत्त्वं रजस्तमश्चैव प्राणिनां संश्रिताः सदा।
त्रिविधा वेदना चैव सर्वसत्त्वेषु दृश्यते ॥ २९ ॥
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति भारत।
भारत! सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण सदा ही प्राणियोंमें स्थित रहते हैं और इनके कारण उन सब जीवोंमें सात्त्विकी, राजसी और तामसी—यह तीन प्रकारकी अनुभूति देखी जाती है॥ २९ १/२ ॥
सुखस्पर्शः सत्त्वगुणो दुःखस्पर्शो रजोगुणः।
तमोगुणेन संयुक्तौ भवतोऽव्यावहारिकौ ॥ ३० ॥
सत्त्वगुण सुखकी अनुभूति करानेवाला है, रजोगुण दुःखकी प्राप्ति कराता है और जब वे दोनों तमोगुण (मोह)-से संयुक्त होते हैं, तब व्यवहारके विषय नहीं रह जाते॥ ३०॥
तत्र यत् प्रीतिसंयुक्तं काये मनसि वा भवेत्।
वर्तते सात्त्विको भाव इत्याचक्षीत तत् तथा ॥ ३१ ॥
जब शरीर या मनमें किसी प्रकारसे भी प्रसन्नताका भाव हो, तब यह कहना चाहिये कि सात्त्विक भावका उदय हुआ है॥ ३१॥
अथ यद् दुःखसंयुक्तमप्रीतिकरमात्मनः।
प्रवृत्तं रज इत्येव तन्न संरभ्य चिन्तयेत् ॥ ३२ ॥
जब अपने मनमें दुःखसे युक्त अप्रसन्नताका भाव जाग्रत् हो, तब यह समझना चाहिये कि रजोगुणकी प्रवृत्ति हुई है। अतः उस दुःखको पाकर मनमें चिन्ता न करे (क्योंकि चिन्तासे दुःख और बढ़ता है) ॥ ३२ ॥
अथ यन्मोहसंयुक्तमव्यक्तविषयं भवेत्।
अप्रतर्क्यमविज्ञेयं तमस्तदुपधारयेत् ॥ ३३ ॥
जब मनमें कोई मोहयुक्त भाव पैदा हो और किसी भी इन्द्रियका विषय स्पष्ट जान न पड़े, उसके विषयमें कोई तर्क भी काम न करे और वह किसी तरह समझमें न आवे, तब यही निश्चय करना चाहिये कि तमोगुणकी वृद्धि हुई है॥ ३३॥
प्रहर्षः प्रीतिरानन्दः सुखं संशान्तचित्तता।
कथंचिदभिवर्तन्त इत्येते सात्त्विका गुणाः ॥ ३४ ॥
जब मनमें किसी प्रकार भी अत्यन्त हर्ष, प्रेम, आनन्द, सुख और शान्तिका अनुभव हो रहा हो, तब इन गुणोंको सात्त्विक समझना चाहिये ॥ ३४ ॥ अतुष्टिः परितापश्च शोको लोभस्तथाक्षमा । लिङ्गानि रजसस्तानी दृश्यन्ते हेत्वहेतुभिः ॥ ३५ ॥ जिस समय किसी कारणसे या बिना कारण ही असंतोष, शोक, संताप, लोभ और असहनशीलताके भाव दिखायी दें तो उन्हें रजोगुणका चिह्न जानना चाहिये ॥ ३५ ॥ अवमानस्तथा मोहः प्रमादः स्वप्नतन्द्रिता । कथंचिदभिवर्तन्ते विविधास्तामसा गुणाः ॥ ३६ ॥ इसी प्रकार जब अपमान, मोह, प्रमाद, स्वप्न, निद्रा और आलस्य आदि दोष किसी तरह भी घेरते हों तो उन्हें तमोगुणके ही विविध रूप समझे ॥ ३६ ॥ दूरगं बहुधागामि प्रार्थनासंशयात्मकम् । मनः सुनियतं यस्य स सुखी प्रेत्य चेह च ॥ ३७ ॥ जिसका दूरतक दौड़ लगानेवाला और अनेक विषयोंकी ओर जानेवाला कामनायुक्त संशयात्मक मन अच्छी तरह वशमें हो जाता है, वह मनुष्य इहलोकमें तथा मरनेके बाद परलोकमें भी सुखी होता है ॥ ३७ ॥ सत्त्वक्षेत्रज्ञयोरेतदन्तरं पश्य सूक्ष्मयोः । सृजते तु गुणानेक एको न सृजते गुणान् ॥ ३८ ॥ बुद्धि और आत्मा—ये दोनों ही सूक्ष्म तत्त्व हैं तथापि इनमें बड़ा भारी अन्तर है। तुम इस अन्तरपर दृष्टिपात करो। इनमें बुद्धि तो गुणोंकी सृष्टि करती है और आत्मा गुणोंकी सृष्टिसे अलग रहता है ॥ ३८ ॥ मशकोडुम्बरौ वापि सम्प्रयुक्तौ यथा सदा । अन्योन्यमेतौ ख्यातां च सम्प्रयोगस्तथा तयोः ॥ ३९ ॥ जैसे गूलरका फल और उसके भीतर रहनेवाले कीड़े एक साथ रहते हुए भी एक-दूसरेसे अलग हैं, उसी प्रकार बुद्धि और आत्मा दोनोंका एक साथ रहना और भिन्न-भिन्न होना समझना चाहिये ॥ ३९ ॥ पृथग्भूतौ प्रकृत्या तौ सम्प्रयुक्तौ च सर्वदा । यथा मत्स्यो जलं चैव सम्प्रयुक्तौ तथैव तौ ॥ ४० ॥ ये दोनों स्वभावसे ही अलग-अलग हैं तो भी सदा एक-दूसरेसे मिले रहते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे मछली और जल एक-दूसरेसे पृथक् होकर भी परस्पर संयुक्त रहते हैं। यही स्थिति बुद्धि और आत्माकी भी है ॥ ४० ॥ न गुणा विदुरात्मानं स गुणान् वेत्ति सर्वशः । परिद्रष्टा गुणानां तु संसृष्टान्मन्यते तथा ॥ ४१ ॥
सत्त्व आदि गुण जड होनेके कारण आत्माको नहीं जानते; किंतु आत्मा चेतन है, इसलिये वह गुणोंको सब प्रकारसे जानता है। यद्यपि आत्मा गुणोंका साक्षी है, अतः उनसे सर्वथा भिन्न है तो भी वह अपनेको उन गुणोंसे संयुक्त मानता है ।। ४१ ।।
इन्द्रियैस्तु प्रदीपार्थं कुरुते बुद्धिसप्तमैः ।
निर्विचेष्टैरजानद्भिः परमात्मा प्रदीपवत् ।। ४२ ।।
जैसे घड़ेमें रखा हुआ दीपक घड़ेके छेदोंसे अपना प्रकाश फैलाकर वस्तुओंका ज्ञान कराता है, उसी प्रकार परमात्मा शरीरके भीतर स्थित होकर चेष्टा और ज्ञानसे शून्य इन्द्रियों तथा मन-बुद्धि इन सातोंके द्वारा सम्पूर्ण पदार्थोंका अनुभव कराता है ।। ४२ ।।
सृजते हि गुणान् सत्त्वं क्षेत्रज्ञः परिपश्यति ।
सम्प्रेयोगस्तयोरेष सत्त्वक्षेत्रज्ञयोर्ध्रुवः ।। ४३ ।।
बुद्धि गुणोंकी सृष्टि करती है और आत्मा साक्षी बनकर देखता रहता है। उन बुद्धि और आत्माका यह संयोग अनादि है ।। ४३ ।।
आश्रयो नास्ति सत्त्वस्य क्षेत्रज्ञस्य च कश्चन ।
सत्त्वं मनः संसृजते न गुणान् वै कदाचन ।। ४४ ।।
बुद्धिका परमात्माके सिवा दूसरा कोई आश्रय नहीं है और क्षेत्रज्ञका भी कोई दूसरा आश्रय नहीं है। बुद्धि मनसे ही घनिष्ठ सम्बन्ध रखती है। गुणोंके साथ उसका साक्षात् सम्पर्क कदापि नहीं होता ।। ४४ ।।
रश्मींस्तेषां स मनसा यदा सम्यङ्नियच्छति ।
तदा प्रकाशतेऽस्यात्मा घटे दीपो ज्वलन्निव ।। ४५ ।।
जब जीव बुद्धिरूपी सारथि और मनरूपी बागडोर-द्वारा इन्द्रियरूपी अश्वोंकी लगाम अच्छी तरह काबूमें रखता है तब घड़ेमें रखे हुए प्रज्वलित दीपकके समान अपने भीतर ही उसका आत्मा प्रकाशित होने लगता है ।। ४५ ।।
त्यक्त्वा यः प्राकृतं कर्म नित्यमात्मरतिर्मुनिः ।
सर्वभूतात्मभूतस्तस्मात् स गच्छेदुत्तमां गतिम् ।। ४६ ।।
जो सांसारिक कर्मोंका परित्याग करके सदा अपने-आपमें ही अनुरक्त रहता है, वह मननशील मुनि सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा होकर परम गतिको प्राप्त होता है ।। ४६ ।।
यथा वारिचरः पक्षी सलिलेन न लिप्यते ।
एवमेव कृतप्रज्ञो भूतेषु परिवर्तते ।। ४७ ।।
जैसे जलचर पक्षी जलसे लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार विशुद्धबुद्धि ज्ञानी पुरुष निर्लिप्त रहकर ही सम्पूर्ण भूतोंमें विचरता है ।। ४७ ।।
एवं स्वभावमेवैतत् स्वबुद्ध्या विहरेन्नरः ।
अशोचन्नप्रहृष्यंश्च समो विगतमत्सरः ।। ४८ ।।
यह आत्मतत्त्व ऐसा ही निर्लिप्त एवं शुद्ध-बुद्धिस्वरूप है—ऐसा अपनी बुद्धिके द्वारा निश्चय करके ज्ञानी पुरुष हर्ष, शोक और मात्सर्य-दोषसे रहित हो सर्वत्र समानभाव रखते हुए विचरे ।। ४८ ।।
स्वभावयुक्त्या युक्तस्तु स नित्यं सृजते गुणान् । ऊर्णनाभिर्यथा सूत्रं विज्ञेयास्तन्तुवद् गुणाः ॥ ४९ ॥ आत्मा अपने स्वरूपमें स्थित रहकर ही सदा गुणोंकी सृष्टि करता है। ठीक उसी तरह, जैसे मकड़ी अपने स्वरूपमें स्थित रहती हुई ही जाला बनाती है। मकड़ीके जालेके ही समान समस्त गुणोंकी सत्ता समझनी चाहिये ॥ ४९ ॥
प्रध्वस्ता न निवर्तन्ते निवृत्तिर्नोपलभ्यते । प्रत्यक्षेण परोक्षं तदनुमानेन सिध्यति ॥ ५० ॥ एवमेकेऽध्यवस्यन्ति निवृत्तिरिति चापरे । उभयं सम्प्रधार्यैतद् व्यवस्येत यथामति ॥ ५१ ॥ आत्मसाक्षात् हो जानेपर गुण नष्ट हो जाते हैं तो भी सर्वथा निवृत्त नहीं होते हैं; क्योंकि उनकी निवृत्ति प्रत्यक्ष नहीं देखी जाती है। जो परोक्ष वस्तु है उसकी सिद्धि अनुमानसे होती है। एक श्रेणीके विद्वानोंका ऐसा ही निश्चय है। दूसरे लोग यह मानते हैं कि गुणोंकी सर्वथा निवृत्ति हो जाती है। इन दोनों मतोंपर भलीभाँति विचार करके अपनी बुद्धिके अनुसार यथार्थ वस्तुका निश्चय करना चाहिये ।। ५०-५१ ।।
इतीमं हृदयग्रन्थिं बुद्धिभेदमयं दृढम् । विमुच्य सुखमासीत न शोचेच्छिन्नसंशयः ॥ ५२ ॥ बुद्धिके द्वारा कल्पित हुआ जो भेद है, वही — हृदयकी सुदृढ़ गाँठ है। उसे खोलकर संशयरहित हो ज्ञानवान् पुरुष सुखसे रहे, कदापि शोक न करे ।। ५२ ।।
मलिनाः प्राप्नुयुः शुद्धिं यथा पूर्णां नदीं नराः । अवगाह्य सुविद्वांसो विद्धि ज्ञानमिदं तथा ॥ ५३ ॥ जैसे मैले शरीरवाले मनुष्य जलसे भरी हुई नदीमें नहा-धोकर साफ-सुथरे हो जाते हैं, उसी प्रकार इस ज्ञानमयी नदीमें अवगाहन करके मलिनचित्त मनुष्य भी शुद्ध एवं ज्ञानसम्पन्न हो जाते हैं—ऐसा जानो ।। ५३ ।।
महानद्या हि पारज्ञस्तप्यते न तदन्यथा । न तु तप्यति तत्त्वज्ञः फले ज्ञाते तरत्युत ॥ ५४ ॥ किसी महानदीके पारको जाननेवाला पुरुष केवल जाननेमात्रसे कृतकृत्य नहीं होता; जबतक वह नौका आदिके द्वारा वहाँ पहुँच न जाय, तबतक वह चिन्तासे संतप्त ही रहता है। परंतु तत्त्वज्ञ पुरुष ज्ञानमात्रसे ही संसार-सागरसे पार हो जाता है; उसे संताप नहीं होता। क्योंकि यह ज्ञान स्वयं ही पुलस्वरूप है ।। ५४ ।।
एवं ये विदुराध्यात्मं केवलं ज्ञानमुत्तमम् ॥ ५५ ॥