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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पञ्चात्मके पञ्चरतौ पञ्चविज्ञानचेतने । शरीरे प्राणिनां जीवं वेत्तुमिच्छामि यादृशम् ॥ १२ ॥ प्राणियोंका शरीर पांचभौतिक है। पाँच विषयोंमें इसकी रति है। इसमें पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और चित्त उपलब्ध होते हैं। इसमें रहनेवाले जीवका स्वरूप कैसा है; इस बातको मैं जानना चाहता हूँ ॥ १२ ॥

मांसशोणितसंघाते मेदःस्नाव्यस्थिसंचये । भिद्यमाने शरीरे तु जीवो नैवोपलभ्यते ॥ १३ ॥ रक्त और मांसके समूह, चर्बी, नाड़ी और हड्डियोंके संग्रहरूपी इस शरीरको चीरने-फाड़नेपर इसके भीतर कोई जीव नहीं उपलब्ध होता ॥ १३ ॥

यद्यजीवं शरीरं तु पञ्चभूतसमन्वितम् । शारीरे मानसे दुःखे कस्तां वेदयते रुजम् ॥ १४ ॥ यदि इस पांचभौतिक शरीरको जीवरहित मान लिया जाय, तब प्रश्न यह होता है कि शरीर अथवा मनमें पीड़ा होनेपर उसके कष्टका अनुभव कौन करता है? ॥ १४ ॥

शृणोति कथितं जीवः कर्णाभ्यां न शृणोति तत् । महर्षे मनसि व्यग्रे तस्माज्जीवो निरर्थकः ॥ १५ ॥ महर्षे! जीव किसीकी कही हुई बातको पहले दोनों कानोंसे सुनता है; परंतु यदि मनमें व्यग्रता रही तो वह सुनकर भी नहीं सुनता; इसलिये मनके अतिरिक्त किसी जीवकी सत्ता मानना व्यर्थ है ॥ १५ ॥

सर्व पश्यति यद् दृश्यं मनोयुक्तेन चक्षुषा । मनसि व्याकुले चक्षुः पश्यन्नपि न पश्यति ॥ १६ ॥ जो भी दृश्य पदार्थ है, उसे प्राणी तभी देख पाता है जब कि उसकी दृष्टिके साथ मनका संयोग हो। यदि मन व्याकुल हो तो उसकी आँख देखती हुई भी नहीं देख पाती है ॥ १६ ॥

न पश्यति न चाघ्राति न शृणोति न भाषते । न च स्पर्शरसौ वेत्ति निद्रावशगतः पुनः ॥ १७ ॥ निद्राके वशमें पड़ा हुआ पुरुष (सम्पूर्ण इन्द्रियोंके होते हुए भी) न देखता है, न सूँघता है, न सुनता है, न बोलता है और न स्पर्श तथा रसका ही अनुभव करता है ॥ १७ ॥

हृष्यति क्रुद्ध्यते कोऽत्र शोचत्युद्विजते च कः । इच्छति ध्यायति द्वेष्टि वाचमीरयते च कः ॥ १८ ॥ अतः यह जिज्ञासा होती है कि इस शरीरके अंदर कौन हर्ष और कौन क्रोध करता है? किसे शोक और उद्वेग होता है? इच्छा, ध्यान, द्वेष और बातचीत कौन करता है? ॥ १८ ॥

भृगुरुवाच

न पञ्चसाधारणमत्र किंचि- च्छरीरमेको वहतेऽन्तरात्मा । स वेत्ति गन्धांश्च रसान् श्रुतीश्च स्पर्शं च रूपं च गुणांश्च येऽन्ये ॥ १९ ॥ भृगुजीने कहा—मुने! मन भी पांचभौतिक ही है; अतः वह पाँचों भूतोंसे भिन्न कोई दूसरा तत्त्व नहीं है। एकमात्र अन्तरात्मा ही इस शरीरका भार वहन करता है, वही रूप, रस, गन्ध, स्पर्श तथा शब्दका और दूसरे भी जो गुण हैं, उनका अनुभव करता है ॥ १९ ॥

पञ्चात्मके पञ्चगुणप्रदर्शी स सर्वगात्रानुगतोऽन्तरात्मा । स वेत्ति दुःखानि सुखानि चात्र तद्विप्रयोगात् तु न वेत्ति देहः ॥ २० ॥ वह अन्तरात्मा पाँचों इन्द्रियोंके गुणोंको धारण करनेवाले मनका द्रष्टा है और वही इस पाञ्चभौतिक शरीरके सम्पूर्ण अवयवोंमें व्याप्त होकर सुख-दुःखका अनुभव करता है। जब उसका शरीरके साथ सम्बन्ध छूट जाता है, तब इस शरीरको सुख-दुःखका भान नहीं होता है (इससे मनके अतिरिक्त उसके साक्षी आत्माकी सत्ता स्वतः सिद्ध हो जाती है) ॥ २० ॥

यदा न रूपं न स्पर्शो नोष्मभावश्च पञ्चके । तदा शान्ते शरीराग्नौ देहत्यागे न नश्यति ॥ २१ ॥ जब पाञ्चभौतिक शरीरमें रूप, स्पर्श और गर्मीका भान नहीं होता, उस अवस्थामें शरीरस्थित अग्निके शान्त हो जानेपर जीवात्मा इस शरीरको त्यागकर भी नष्ट नहीं होता ॥ २१ ॥

आपोमयमिदं सर्वमापो मूर्तिः शरीरिणाम् । तत्रात्मा मानसो ब्रह्मा सर्वभूतेषु लोककृत् ॥ २२ ॥ यह सब प्रपंच जलमय है, प्राणियोंका यह शरीर भी प्रायः जलमय ही है। उसमें मनमें रहनेवाला आत्मा विद्यमान है। वही सम्पूर्ण भूतोंमें लोकस्रष्टा ब्रह्माके नामसे विख्यात है; क्योंकि समस्त जीवोंके संघातका ही नाम ब्रह्मा है ॥ २२ ॥

आत्मा क्षेत्रज्ञ इत्युक्तः संयुक्तः प्राकृतैर्गुणैः । तैरेव तु विनिर्मुक्तः परमात्मेत्युदाहृतः ॥ २३ ॥ आत्मा जब प्राकृत गुणोंसे युक्त होता है, तब उसे क्षेत्रज्ञ कहते हैं और उन्हीं गुणोंसे जब वह मुक्त हो जाता है, तब परमात्मा कहलाता है ॥ २३ ॥

आत्मानं तं विजानीहि सर्वलोकहितात्मकम् । तस्मिन् यः संश्रितो देहे ह्यब्बिन्दुरिव पुष्करे ॥ २४ ॥

तुम क्षेत्रज्ञको आत्मा ही समझो। वह सर्वलोक-हितकारी है। इस शरीरमें रहकर भी वह कमल-पत्रपर पड़े हुए जलबिन्दु की तरह वास्तवमें इससे पृथक् ही है ॥ २४ ॥ क्षेत्रज्ञं तं विजानीहि नित्यं लोकहितात्मकम् । तमो रजश्च सत्त्वं च विद्धि जीवगुणानिमान् ॥ २५ ॥ उस क्षेत्रज्ञको सदा आत्मा ही जानो। वह सम्पूर्ण जगत्का हितस्वरूप है। तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुण—इन तीनों प्राकृत गुणोंको प्रकृति-स्थित होनेके कारण जीवके गुण समझो ॥ २५ ॥ सचेतनं जीवगुणं वदन्ति स चेष्टते चेष्टयते च सर्वम् । अतः परं क्षेत्रविदो वदन्ति प्रावर्तयद् यो भुवनानि सप्त ॥ २६ ॥ चेतन जीवके सम्बन्धसे उपर्युक्त जीवके गुणोंको चेतनायुक्त कहते हैं*। वह जीव स्वयं चेष्टा करता है और सबसे चेष्टा करवाता है। शरीरके तत्त्वको जाननेवाले पुरुष इस क्षेत्रज्ञ आत्मासे उस परमात्माको श्रेष्ठ बताते हैं, जिसने भूःभुवः आदि सातों लोकोंको उत्पन्न किया है ॥ २६ ॥ न जीवनाशोऽस्ति हि देहभेदे मिथ्यैतदाहुर्मृत इत्यबुद्धाः । जीवस्तु देहान्तरितः प्रयाति दशार्धतैवास्य शरीरभेदः ॥ २७ ॥ देहका नाश होनेपर भी जीवका नाश नहीं होता। जो जीवकी मृत्यु बताते हैं, वे अज्ञानी हैं और उनका वह कथन मिथ्या है। जीव तो इस मृत देहका त्याग करके दूसरे शरीरमें चला जाता है। शरीरके पाँच तत्त्वोंका अलग-अलग हो जाना ही शरीरका नाश है ॥ २७ ॥ एवं सर्वेषु भूतेषु गूढश्चरति संवृतः । दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया तत्त्वदर्शिभिः ॥ २८ ॥ इस प्रकार आत्मा सम्पूर्ण प्राणियोंके भीतर उनकी हृदयगुफामें गूढ़भावसे छिपा रहता है। वह तत्त्वदर्शी पुरुषोंद्वारा तीक्ष्ण एवं सूक्ष्म बुद्धिसे साक्षात् किया जाता है ॥ तं पूर्वापररात्रेषु युञ्जानः सततं बुधः । लघ्वाहारो विशुद्धात्मा पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥ २९ ॥ जो विद्वान् परिमित आहार करके रातके पहले और पिछले पहरमें सदा ध्यानयोगका अभ्यास करता है, वह अन्तःकरण शुद्ध होनेपर अपने हृदयमें ही उस आत्माका साक्षात्कार कर लेता है ॥ २९ ॥ चित्तस्य हि प्रसादेन हित्वा कर्म शुभाशुभम् । प्रसन्नात्माऽऽत्मनि स्थित्वा सुखमानन्त्यमश्नुते ॥ ३० ॥

चित्त शुद्ध होनेपर वह शुभाशुभ कर्मोंसे अपना सम्बन्ध हटाकर प्रसन्नचित्त हो आत्मस्वरूपमें स्थित हो जाता है और अनन्त आनन्दका अनुभव करने लगता है ॥ ३० ॥

मानसोऽग्निः शरीरेषु जीव इत्यभिधीयते ।
सृष्टिः प्रजापतेरेषा भूताध्यात्मविनिश्चये ॥ ३१ ॥

समस्त शरीरोंमें मनके भीतर रहनेवाला जो अग्निके समान प्रकाशस्वरूप चैतन्य है, उसीको समष्टि जीवस्वरूप प्रजापति कहते हैं। उसी प्रजापतिसे यह सृष्टि उत्पन्न हुई है। यह बात अध्यात्मतत्त्वका निश्चय करके कही गयी है ॥ ३१ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि भृगुभरद्वाजसंवादे
जीवस्वरूपनिरूपणे सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें भृगु-भरद्वाजके संवादके प्रसंगमें जीवके स्वरूपका निरूपणविषयक एक सौ सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८७ ॥


* जैसे लोहा दाहक एवं दीप्तिमान् हो उठता है, उसी प्रकार चेतन जीवके संसर्गसे उसके सत्त्वादि गुणको भी चैतन्ययुक्त कहते हैं।

वर्णविभागपूर्वक मनुष्योंकी और समस्त प्राणियोंकी उत्पत्तिका वर्णन

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अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

वर्णविभागपूर्वक मनुष्योंकी और समस्त प्राणियोंकी उत्पत्तिका वर्णन

भृगुरुवाच

असृजद् ब्राह्मणानेव पूर्वं ब्रह्मा प्रजापतीन् ।
आत्मतेजोभिनिर्वृत्तान् भास्कराग्निसमप्रभान् ॥ १ ॥
भृगुजी कहते हैं—मुने! ब्रह्माजीने सृष्टिके प्रारम्भमें अपने तेजसे सूर्य और अग्निके समान प्रकाशित होनेवाले ब्राह्मणों, मरीचि आदि प्रजापतियोंको ही उत्पन्न किया ॥ १ ॥

ततः सत्यं च धर्मं च तपो ब्रह्म च शाश्वतम् ।
आचारं चैव शौचं च स्वर्गाय विदधे प्रभुः ॥ २ ॥
उसके बाद भगवान् ब्रह्माने स्वर्ग-प्राप्तिके साधनभूत सत्य, धर्म, तप, सनातन वेद, आचार और शौचके नियम बनाये ॥ २ ॥

देवदानवगन्धर्वा दैत्यासुरमहोरगाः ।
यक्षराक्षसनागाश्च पिशाचा मनुजास्तथा ॥ ३ ॥
तदनन्तर देवता, दानव, गन्धर्व, दैत्य, असुर, महान् सर्प, यक्ष, राक्षस, नाग, पिशाच और मनुष्योंको उत्पन्न किया ॥ ३ ॥

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च द्विजसत्तम ।
ये चान्ये भूतसङ्घानां सङ्घास्तांश्चापि निर्ममे ॥ ४ ॥
द्विजश्रेष्ठ! फिर उन्होंने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—इन चारों वर्णोंकी रचना की और प्राणिसमूहोंमें जो अन्य समुदाय हैं, उनकी भी सृष्टि की ॥ ४ ॥

ब्राह्मणानां सितो वर्णः क्षत्रियाणां तु लोहितः ।
वैश्यानां पीतको वर्णः शूद्राणामसितस्तथा ॥ ५ ॥
ब्राह्मणोंका रंग श्वेत, क्षत्रियोंका लाल, वैश्योंका पीला तथा शूद्रोंका काला बनाया ॥ ५ ॥

भरद्वाज उवाच

चातुर्वर्ण्यस्य वर्णेन यदि वर्णो विभिद्यते ।
सर्वेषां खलु वर्णानां दृश्यते वर्णसंकरः ॥ ६ ॥
भरद्वाजने पूछा—प्रभो! यदि चारों वर्णोंमेंसे एक वर्णके साथ दूसरे वर्णका रंग-भेद है, तब तो सभी वर्णोंमें विभिन्न रंगके मनुष्य होनेके कारण वर्णसंकरता ही दिखायी देती है ॥ ६ ॥

कामः क्रोधो भयं लोभः शोकश्चिन्ता क्षुधा श्रमः । सर्वेषां नः प्रभवति कस्माद् वर्णो विभिद्यते ॥ ७ ॥ काम, क्रोध, भय, लोभ, शोक, चिन्ता, क्षुधा और थकावटका प्रभाव हम सब लोगोंपर समानरूपसे ही पड़ता है; फिर वर्णोंका भेद कैसे सिद्ध होता है? ॥ ७ ॥

स्वेदमूत्रपुरीषाणि श्लेष्मा पित्तं सशोणितम् । तनुः क्षरति सर्वेषां कस्माद् वर्णो विभज्यते ॥ ८ ॥ हम सब लोगोंके शरीरसे पसीना, मल, मूत्र, कफ, पित्त और रक्त निकलते हैं। ऐसी दशामें रंगके द्वारा वर्णोंका विभाग कैसे किया जा सकता है? ॥ ८ ॥

जङ्गमानामसंख्येयाः स्थावराणां च जातयः । तेषां विविधवर्णानां कुतो वर्णविनिश्चयः ॥ ९ ॥ पशु, पक्षी, मनुष्य आदि जंगम प्राणियों तथा वृक्ष आदि स्थावर जीवोंकी असंख्य जातियाँ हैं। उनके रंग भी नाना प्रकारके हैं, अतः उनके वर्णोंका निश्चय कैसे हो सकता है? ॥ ९ ॥

भृगुरुवाच

न विशेषोऽस्ति वर्णानां सर्वं ब्राह्ममिदं जगत् । ब्रह्मणा पूर्वसृष्टं हि कर्मभिर्वर्णतां गतम् ॥ १० ॥ **भृगुजीने कहा—**मुने! पहले वर्णोंमें कोई अन्तर नहीं था, ब्रह्माजीसे उत्पन्न होनेके कारण यह सारा जगत् ब्राह्मण ही था। पीछे विभिन्न कर्मोंके कारण उनमें वर्णभेद हो गया ॥ १० ॥

कामभोगप्रियास्तीक्ष्णाः क्रोधनाः प्रियसाहसाः । त्यक्तस्वधर्मा रक्ताङ्गास्ते द्विजाः क्षत्रतां गताः ॥ ११ ॥ जो अपने ब्राह्मणोचित धर्मका परित्याग करके विषयभोगके प्रेमी, तीखे स्वभाववाले, क्रोधी और साहसका काम पसंद करनेवाले हो गये और इन्हीं कारणोंसे जिनके शरीरका रंग लाल हो गया, वे ब्राह्मण क्षत्रिय-भावको प्राप्त हुए—क्षत्रिय कहलाने लगे ॥ ११ ॥

गोभ्यो वृत्तिं समास्थाय पीताः कृष्युपजीविनः । स्वधर्मान् नानुतिष्ठन्ति ते द्विजा वैश्यतां गताः ॥ १२ ॥ जिन्होंने गौओंसे तथा कृषिकर्मके द्वारा जीविका चलानेकी वृत्ति अपना ली और उसीके कारण जिनके रंग पीले पड़ गये तथा जो ब्राह्मणोचित धर्मको छोड़ बैठे, वे ही ब्राह्मण वैश्यभावको प्राप्त हुए ॥ १२ ॥

हिंसानृतप्रिया लुब्धाः सर्वकर्मोपजीविनः । कृष्णाः शौचपरिभ्रष्टास्ते द्विजाः शूद्रतां गताः ॥ १३ ॥

जो शौच और सदाचारसे भ्रष्ट होकर हिंसा और असत्यके प्रेमी हो गये, लोभवश व्याधोंके समान सभी तरहके निन्द्य कर्म करके जीविका चलाने लगे और इसीलिये जिनके शरीरका रंग काला पड़ गया, वे ब्राह्मण शूद्रभावको प्राप्त हो गये ॥ १३ ॥ इत्येतैः कर्मभिर्व्यस्ता द्विजा वर्णान्तरं गताः । धर्मो यज्ञक्रिया तेषां नित्यं न प्रतिषिध्यते ॥ १४ ॥ इन्हीं कर्मोंके कारण ब्राह्मणत्वसे अलग होकर वे सभी ब्राह्मण दूसरे-दूसरे वर्णके हो गये, किंतु उनके लिये नित्यधर्मानुष्ठान और यज्ञकर्मका कभी निषेध नहीं किया गया है ॥ १४ ॥ इत्येते चतुरो वर्णा येषां ब्राह्मी सरस्वती । विहिता ब्रह्मणा पूर्वं लोभात् त्वज्ञानतां गताः ॥ १५ ॥ इस प्रकार ये चार वर्ण हुए, जिनके लिये ब्रह्माजीने पहले ब्राह्मी सरस्वती (वेदवाणी) प्रकट की। परंतु लोभविशेषके कारण शूद्र अज्ञानभावको प्राप्त हुए—वेदाध्ययनके अनधिकारी हो गये ॥ १५ ॥ ब्राह्मणा ब्रह्मतन्त्रस्थास्तपस्तेषां न नश्यति । ब्रह्म धारयतां नित्यं व्रतानि नियमांस्तथा ॥ १६ ॥ जो ब्राह्मण वेदकी आज्ञाके अधीन रहकर सारा कार्य करते, वेदमन्त्रोंको स्मरण रखते और सदा व्रत एवं नियमोंका पालन करते हैं, उनकी तपस्या कभी नष्ट नहीं होती ॥ १६ ॥ ब्रह्म चैव परं सृष्टं ये न जानन्ति तेऽद्विजाः । तेषां बहुविधास्त्वन्यास्तत्र तत्र हि जातयः ॥ १७ ॥ जो इस सारी सृष्टिको परब्रह्म परमात्माका रूप नहीं जानते हैं, वे द्विज कहलानेके अधिकारी नहीं हैं। ऐसे लोगोंको नाना प्रकारकी दूसरी-दूसरी योनियोंमें जन्म लेना पड़ता है ॥ १७ ॥ पिशाचा राक्षसाः प्रेता विविधा म्लेच्छजातयः । प्रणष्टज्ञानविज्ञानाः स्वच्छन्दाचारचेष्टिता ॥ १८ ॥ वे ज्ञान-विज्ञानसे हीन और स्वेच्छाचारी लोग पिशाच, राक्षस, प्रेत तथा नाना प्रकारकी म्लेच्छ-जातिके होते हैं ॥ १८ ॥ प्रजा ब्राह्मणसंस्काराः स्वकर्मकृतनिश्चयाः । ऋषिभिः स्वेन तपसा सृज्यन्ते चापरे परैः ॥ १९ ॥ पीछेसे ऋषियोंने अपनी तपस्याके बलसे कुछ ऐसी प्रजा उत्पन्न की, जो वैदिक संस्कारोंसे सम्पन्न तथा अपने धर्म-कर्ममें दृढ़तापूर्वक डटी रहनेवाली थी। इस प्रकार प्राचीन ऋषियोंद्वारा अर्वाचीन ऋषियोंकी सृष्टि होने लगी ॥ १९ ॥ आदिदेवसमुद्भूता ब्रह्ममूलाक्षयाव्यया । सा सृष्टिर्मानसी नाम धर्मतन्त्रपरायणा ॥ २० ॥

किंतु जो सृष्टि आदिदेव ब्रह्माके मनसे उत्पन्न हुई है, जिसके जड़-मूल केवल ब्रह्माजी ही हैं तथा जो अक्षय, अविकारी एवं धर्ममें तत्पर रहनेवाली है, वह सृष्टि मानसी कहलाती है ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि भृगुभरद्वाजसंवादे वर्णविभागकथने अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें भृगु-भरद्वाजके प्रसंगमें वर्णोंके विभागका वर्णनविषयक एक सौ अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८८ ॥

चारों वर्णोंके अलग-अलग कर्मोंका और सदाचारका वर्णन तथा वैराग्यसे परब्रह्मकी प्राप्ति

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एकोननवत्यधिकशततमोऽध्यायः

चारों वर्णोंके अलग-अलग कर्मोंका और सदाचारका वर्णन तथा वैराग्यसे परब्रह्मकी प्राप्ति

भरद्वाज उवाच

ब्राह्मणः केन भवति क्षत्रियो वा द्विजोत्तम ।
वैश्यः शूद्रश्च विप्रर्षे तद् ब्रूहि वदतां वर ॥ १ ॥
भरद्वाजने पूछा— वक्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्मर्षे! द्विजोत्तम! अब मुझे यह बताइये कि मनुष्य कौन-सा कर्म करनेसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र होता है? ॥ १ ॥

भृगुरुवाच

जातकर्मादिभिर्यस्तु संस्कारैः संस्कृतः शुचिः ।
वेदाध्ययनसम्पन्नः षट्सु कर्मस्ववस्थितः ॥ २ ॥
शौचाचारस्थितः सम्यग्विघसाशी गुरुप्रियः ।
नित्यव्रती सत्यपरः स वै ब्राह्मण उच्यते ॥ ३ ॥
भृगुजीने कहा— जो जाति, कर्म आदि संस्कारोंसे सम्पन्न, पवित्र तथा वेदोंके स्वाध्यायमें संलग्न है, (यजन-याजन, अध्ययनाध्यापन और दान-प्रतिग्रह—इन) छः कर्मोंमें स्थित रहता है, शौच एवं सदाचारका पालन तथा परम उत्तम यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करता है, गुरुके प्रति प्रेम रखता, नित्य व्रतका पालन करता तथा सत्यमें तत्पर रहता है, वही ब्राह्मण कहलाता है ॥ २-३ ॥

सत्यं दानमथाद्रोह आनृशंस्यं त्रपा घृणा ।
तपश्च दृश्यते यत्र स ब्राह्मण इति स्मृतः ॥ ४ ॥
जिसमें सत्य, दान, द्रोह न करनेका भाव, क्रूरताका अभाव, लज्जा, दया और तप—ये सद्गुण देखे जाते हैं, वह ब्राह्मण माना गया है ॥ ४ ॥

क्षत्रजं सेवते कर्म वेदाध्ययनसंगतः ।
दानादानरतिर्यस्तु स वै क्षत्रिय उच्यते ॥ ५ ॥
जो क्षत्रियोचित युद्ध आदि कर्मका सेवन करता है, वेदोंके अध्ययनमें लगा रहता है, ब्राह्मणोंको दान देता है और प्रजासे कर लेकर उसकी रक्षा करता है, वह क्षत्रिय कहलाता है ॥ ५ ॥

वणिज्या पशुरक्षा च कृष्यादानरतिः शुचिः ।
वेदाध्ययनसम्पन्नः स वैश्य इति संज्ञितः ॥ ६ ॥

इसी प्रकार जो वेदाध्ययनसे सम्पन्न होकर व्यापार, पशुपालन और खेतीका काम करके अन्न संग्रह करनेकी रुचि रखता है और पवित्र रहता है, वह वैश्य कहलाता है ।।
सर्वभक्षरतिर्नित्यं सर्वकर्मकरोऽशुचिः ।
त्यक्तवेदस्त्वनाचारः स वै शूद्र इति स्मृतः ॥ ७ ॥
किंतु जो वेद और सदाचारका परित्याग करके सदा सब कुछ खानेमें अनुरक्त रहता है और सब तरहके काम करता है, साथ ही बाहर-भीतरसे अपवित्र रहता है, वह शूद्र कहा गया है ।। ७ ।।
शूद्रे चैतद्भवेल्लक्ष्यं द्विजे तच्च न विद्यते ।
न वै शूद्रो भवेच्छूद्रो ब्राह्मणो न च ब्राह्मणः ॥ ८ ॥
उपर्युक्त सत्य आदि सात गुण यदि शूद्रमें दिखायी दें और ब्राह्मणमें न हों तो वह शूद्र शूद्र नहीं है और वह ब्राह्मण ब्राह्मण नहीं है ।। ८ ।।
सर्वोपायैस्तु लोभस्य क्रोधस्य च विनिग्रहः ।
एतत् पवित्रं ज्ञानानां तथा चैवात्मसंयमः ॥ ९ ॥
सभी उपायोंसे लोभ और क्रोधको जीतना चाहिये। यही ज्ञानोंमें पवित्र ज्ञान है और यही आत्मसंयम है ।।
वार्यौ सर्वात्मना तौ हि श्रेयोघातार्थमुच्छ्रितौ ।
नित्यं क्रोधाच्छ्रियं रक्षेत् तपो रक्षेच्च मत्सरात् ॥ १० ॥
विद्यां मानापमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः ।
क्रोध और लोभ मनुष्यके कल्याणमें बाधा डालनेके लिये सदा उद्यत रहते हैं; अतः पूरी शक्ति लगाकर इन दोनोंका निवारण करना चाहिये। धन-सम्पत्तिको क्रोधके आघातसे बचाना चाहिये, तपको मात्सर्यके आघातसे बचाना चाहिये, विद्याको मान-अपमानसे और अपने-आपको प्रमादके आक्रमणके बचाना चाहिये ।। १०½ ।।
यस्य सर्वे समारम्भा निराशीर्बन्धना द्विज ॥ ११ ॥
त्यागे यस्य हुतं सर्वं स त्यागी च स बुद्धिमान् ।
ब्रह्मन्! जिसके सभी कार्य कामनाओंके बन्धनसे रहित होते हैं तथा जिसने त्यागकी अतामें सब कुछ होम दिया है, वही त्यागी और वही बुद्धिमान् है ।। ११½ ।।
अहिंस्रः सर्वभूतानां मैत्रायणगतश्चरेत् ॥ १२ ॥
परिग्रहान् परित्यज्य भवेद् बुद्ध्या जितेन्द्रियः ।
अशोकं स्थानमातिष्ठेदिह चामुत्र चाभयम् ॥ १३ ॥
किसी भी प्राणीकी हिंसा न करे, सबके साथ मैत्रीपूर्ण बर्ताव करे। स्त्री-पुत्र आदिकी ममता एवं आसक्तिको त्यागकर बुद्धिके द्वारा इन्द्रियोंको वशमें करे और उस स्थितिको प्राप्त करे, जो इहलोक और परलोकमें भी निर्भय एवं शोकरहित है ।। १२-१३ ।।
तपोनित्येन दान्तेन मुनिना संयतात्मना ।

अजितं जेतुकामेन भाव्यं सङ्गेष्वसङ्गिना ॥ १४ ॥
नित्य तप करे, मननशील होकर इन्द्रियोंका दमन और मनका संयम करे। आसक्तिके आश्रयभूत देह-गेह आदिमें आसक्त न होकर अजित (परमात्मा) को जीतने (प्राप्त करने) की इच्छा रखे ॥ १४ ॥

इन्द्रियैर्गृह्यते यद् यत् तत्तद् व्यक्तमिति स्थितिः ।
अव्यक्तमिति विज्ञेयं लिङ्गग्राह्यमतीन्द्रियम् ॥ १५ ॥
इन्द्रियोंसे जिसका ग्रहण होता है, वह सब व्यक्त, कहलाता है। जो इन्द्रियातीत होनेके कारण अनुमानसे ही जाना जाय, उसे अव्यक्त समझना चाहिये ॥ १५ ॥

अविस्रम्भे न गन्तव्यं विस्रम्भे धारयेन्मनः ।
मनः प्राणे निगृह्णीयात् प्राणं ब्रह्मणि धारयेत् ॥ १६ ॥
जो विश्वासके योग्य नहीं है, उस मार्गपर न चले और जो विश्वास करनेयोग्य है, उसमें मन लगावे। मनको प्राणमें और प्राणको ब्रह्ममें स्थापित करे ॥ १६ ॥

निर्वेदादेव निर्वाणं न च किञ्चिद् विचिन्तयेत् ।
सुखं वै ब्रह्मणो ब्रह्म निर्वेदेनाधिगच्छति ॥ १७ ॥
वैराग्यसे ही निर्वाणपद (मोक्ष) प्राप्त होता है। उसे पाकर मनुष्य किसी अनात्मपदार्थका चिन्तन नहीं करता है। ब्राह्मण संसारसे वैराग्य होनेपर सुखस्वरूप परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है ॥ १७ ॥

शौचेन सततं युक्तः सदाचारसमन्वितः ।
सानुक्रोशश्च भूतेषु तद् द्विजातिषु लक्षणम् ॥ १८ ॥
सर्वदा शौच और सदाचारका पालन करे और समस्त प्राणियोंपर दयाभाव बनाये रखे; यह ब्राह्मणका प्रधान लक्षण है ॥ १८ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि भृगुभरद्वाजसंवादे वर्णस्वरूपकथने
एकोननवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें भृगु-भरद्वाजसंवादके प्रसंगमें वर्णोंके स्वरूपका कथनविषयक एक सौ नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८९ ॥

१९०-

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नवत्यधिकशततमोऽध्यायः

सत्यकी महिमा, असत्यके दोष तथा लोक और परलोकके सुख-दुःखका विवेचन

भृगुरुवाच

सत्यं ब्रह्म तपः सत्यं सत्यं विसृजते प्रजाः ।
सत्येन धार्यते लोकः स्वर्गं सत्येन गच्छति ॥ १ ॥
भृगुजी कहते हैं—मुने! सत्य ही ब्रह्म है, सत्य ही तप है, सत्य ही प्रजाकी सृष्टि करता है, सत्यके ही आधारपर संसार टिका हुआ है और सत्यके ही प्रभावसे मनुष्य स्वर्गमें जाता है ॥ १ ॥

अनृतं तमसो रूपं तमसा नीयते ह्यधः ।
तमोग्रस्ता न पश्यन्ति प्रकाशं तमसाऽऽवृताः ॥ २ ॥
असत्य अन्धकारका रूप है। वह मनुष्यको नीचे गिराता है। अज्ञानान्धकारसे घिरे हुए मनुष्य तमोगुणसे ग्रस्त होकर ज्ञानके प्रकाशको नहीं देख पाते हैं ॥ २ ॥

स्वर्गः प्रकाश इत्याहुर्नरकं तम एव च ।
सत्यानृतं तदुभयं प्राप्यते जगतीचरैः ॥ ३ ॥
स्वर्ग प्रकाशमय है और नरक अन्धकारमय है, ऐसा कहते हैं। सत्य और अनृतसे युक्त जो मानव-योनि है, वह ज्ञान और अज्ञान दोनोंके सम्मिश्रणसे जगत्‌के जीवोंको प्राप्त होती है ॥ ३ ॥

तत्राप्येवंविधा लोके वृत्तिः सत्यानृते भवेत् ।
धर्माधर्मौ प्रकाशश्च तमो दुःखं सुखं तथा ॥ ४ ॥
उसमें भी लोकमें ऐसी वृत्ति जाननी चाहिये, जो सत्य और अनृत हैं, वे ही धर्म और अधर्म, प्रकाश और अन्धकार तथा दुःख और सुख हैं ॥ ४ ॥

तत्र यत् सत्यं स धर्मो यो धर्मः स प्रकाशो यः प्रकाशस्तत् सुखमिति । तत्र यदनृतं सोऽधर्मो योऽधर्मस्तत् तमो यत् तमस्तद् दुःखमिति ॥ ५ ॥
वहाँ जो सत्य है, वही धर्म है, जो धर्म है वही प्रकाश है और जो प्रकाश है, वही सुख है। इसी प्रकार वहाँ जो अनृत अर्थात् असत्य है, वही अधर्म है और जो अधर्म है, वही अन्धकार है और जो अन्धकार है, वही दुःख है ॥ ५ ॥

अत्रोच्यते—
शारीरैर्मानसैर्दुःखैः सुखैश्चाप्यसुखोदर्यैः ।
लोकसृष्टिं प्रपश्यन्तो न मुह्यन्ति विचक्षणाः ॥ ६ ॥

इस विषयमें ऐसा कहा जाता है—संसारकी सृष्टि शारीरिक और मानसिक क्लेशोंसे युक्त है। इसमें जो सुख हैं, वे भी अन्तमें दुःख ही उत्पन्न करनेवाले हैं। ऐसी दृष्टि रखनेवाले विद्वान् पुरुष कभी मोहमें नहीं पड़ते हैं ।। ६ ।।

तत्र दुःखविमोक्षार्थं प्रयतेत विचक्षणः ।
सुखं ह्यनित्यं भूतानामिहलोके परत्र च ।। ७ ।।
अतः विज्ञ एवं बुद्धिमान् मनुष्यको चाहिये कि सदा दुःखसे छूटनेके लिये प्रयत्न करे। इहलोक और परलोकमें भी प्राणियोंको जो सुख मिलता है, वह अनित्य है ।। ७ ।।

राहुग्रस्तस्य सोमस्य यथा ज्योत्स्ना न भासते ।
तथा तमोऽभिभूतानां भूतानां नश्यते सुखम् ।। ८ ।।
जैसे राहुसे ग्रस्त होनेपर चन्द्रमाकी चाँदनी प्रकाशमें नहीं आती, उसी प्रकार तम (अज्ञान एवं दुःख) से पीड़ित हुए प्राणियोंका सुख नष्ट हो जाता है ।। ८ ।।

तत् खलु द्विविधं सुखमुच्यते शारीरं मानसं च । इह खल्वमुष्मिंश्च लोके वस्तुप्रवृत्तयः सुखार्थ-मभिधीयन्ते । न ह्यतः परं त्रिवर्गफलं विशिष्टतरमस्ति स एव काम्यो गुणविशेषो धर्मार्थगुणारम्भस्तद्धेतुर-स्योत्पत्तिः सुखप्रयोजनार्थ आरम्भः ।। ९ ।।
सुख दो प्रकारका बताया जाता है—शारीरिक और मानसिक। इहलोक और परलोकमें जो वस्तुओंकी प्राप्तिके लिये प्रवृत्तियाँ हैं, वे सुखके लिये ही बतायी जाती हैं। इस सुखसे बढ़कर त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ और काम) का और कोई अत्यन्त विशिष्ट फल नहीं है। वह सुख ही प्राणीका वाञ्छनीय गुणविशेष है। धर्म और अर्थ जिसके अंग हैं, उस सुखके लिये ही कर्मोंका आरम्भ किया जाता है; क्योंकि सुखकी उत्पत्तिमें उद्यम ही हेतु हैं; अतः सुखके उद्देश्यसे ही कर्मोंका आरम्भ किया जाता है ।। ९ ।।

भरद्वाज उवाच

यदेतद् भवताभिहितं सुखानां परमा स्थितिरिति न तदुपगृह्लीमो न ह्येषामृषीणां महति स्थितानामप्राप्य एष काम्यो गुणविशेषो न चैनमभिलषन्ति च तपसि श्रूयते त्रिलोककृद् ब्रह्मा प्रभुरेकाकी तिष्ठति । ब्रह्मचारी न कामसुखेष्वात्मानमवदधाति । अपि च भगवान् विश्वेश्वर उमापतिः काममभिवर्तमानमनङ्गत्त्वेन शममनयत् । तस्माद् ब्रूमो न तु महात्मभिरयं प्रतिगृहीतो न त्वेषां तावद्विशिष्टो गुणविशेष इति । नैतद् भगवतः प्रत्येमि भगवता तूक्तं सुखान्न परमस्तीति लोकप्रवादो हि द्विविधः फलोदयः सुकृतात् सुखमवाप्यते दुष्कृताद् दुःखमिति ।। १० ।।
भरद्वाजने पूछा—प्रभो! आपने जो यह बताया है कि सुखोंका ही सबसे ऊँचा स्थान है—सुखसे बढ़कर त्रिवर्गका और कोई फल नहीं है, आपकी यह बात हमारे मनमें ठीक नहीं जँचती है; क्योंकि जो महान् तपमें स्थित ऋषिगण हैं, उनके लिये यह वाञ्छनीय

गुणविशेष सुख यद्यपि प्राप्त हो सकता है, तो भी वे इसे नहीं चाहते हैं। सुना जाता है कि तीनों लोकोंकी सृष्टि करनेवाले भगवान् ब्रह्मा अकेले ही रहते हैं, ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं और कामसुखमें कभी मन नहीं लगाते हैं। भगवती उमाके प्राणवल्लभ भगवान् विश्वनाथने भी अपने सामने आये हुए कामको जलाकर शान्त कर दिया और उसे अनंग बना दिया; इसलिये हम कहते हैं कि महात्मा पुरुषोंने कभी इसे स्वीकार नहीं किया है। उनके लिये यह कामसुख अर्थात् सांसारिक भोगोंका सुख सबसे बढ़कर सुखविशेष नहीं है; परंतु आपकी बातोंसे मुझे ऐसी प्रतीति नहीं होती है। आपने तो यह कहा है कि इस सुखसे बढ़कर दूसरा कोई फल नहीं है। लोकमें ऐसा कहा जाता है कि फलकी उत्पत्ति दो प्रकारकी होती है। पुण्यकर्मसे सुख प्राप्त होता है और पापकर्मसे दुःख ।। १० ।।

भृगुरुवाच

अत्रोच्यते-अनृतात् खलु तमः प्रादुर्भूतं ततस्तमो-ग्रस्ता अधर्ममेवानुवर्तन्ते न धर्मं क्रोधलोभहिंसानृता-दिभिरवच्छन्ना न खल्वस्मिँल्लोके नामुत्र सुखमाप्नु-वन्ति । विविधव्याधिरुजोपतापैरवकीर्यन्ते । वधबन्धन-परिक्लेशादिभिश्च क्षुत्पिपासाश्रमकृतैरुपतापैरुप-तप्यन्ते । वर्षवातात्युष्णातिशीतकृतैश्च प्रतिभयैः शारीरैर्दुःखैरुपतप्यन्ते । बन्धुधनविनाशविप्रयोगकृतैश्च मानसैः शोकैरभिभूयन्ते जरामृत्युकृतैश्चान्यैरिति ।। ११ ।।

भृगुजीने कहा—मुने! असत्यसे अज्ञानकी उत्पत्ति हुई है; अतः तमोग्रस्त मनुष्य अधर्मके ही पीछे चलते हैं; धर्मका अनुसरण नहीं करते हैं। जो लोग क्रोध, लोभ, हिंसा और असत्य आदिसे आच्छादित हैं, वे न तो इस लोकमें सुखी होते हैं और न परलोकमें ही। वे नाना प्रकारके रोग, व्याधि और तापसे संतप्त होते रहते हैं। वध और बन्धन आदिके क्लेशोंसे तथा भूख, प्यास और थकावटके कारण होनेवाले संतापोंसे भी पीड़ित होते हैं। इतना ही नहीं, उन्हें आँधी, पानी, अत्यन्त गर्मी और अधिक सर्दीसे उत्पन्न हुए भयंकर शारीरिक कष्ट भी सहन करने पड़ते हैं। बन्धु-बान्धवोंकी मृत्यु, धनके नाश और प्रेमीजनोंके वियोगके कारण होनेवाले मानसिक शोक भी उन्हें सताते रहते हैं। बुढ़ापा और मृत्युके कारण भी बहुत-से दूसरे-दूसरे क्लेश भी उन्हें पीड़ा देते रहते हैं ।।

यस्त्वेतैः शारीरमानसैर्दुःखैर्न संस्पृश्यते स सुखं वेद । न चैते दोषाः स्वर्गे प्रादुर्भवन्ति । तत्र खलु भवन्ति ।। १२ ।।

जो इन शारीरिक और मानसिक दुःखोंके सम्बन्धसे रहित है, उसीको सुखका अनुभव होता है। स्वर्गलोकमें ये पूर्वोक्त दुःखरूप दोष नहीं उत्पन्न होते हैं। वहाँ निम्नांकित बातें होती हैं ।। १२ ।।

सुमुखः पवनः स्वर्गे गन्धश्च सुरभिस्तथा ।
क्षुत्पिपासा श्रमो नास्ति न जरा न च पापकम् ।। १३ ।।

स्वर्गमें अत्यन्त सुखदायिनी हवा चलती है। मनोहर सुगन्ध छायी रहती है। भूख, प्यास, परिश्रम, बुढ़ापा और पापके फलका कष्ट वहाँ कभी नहीं भोगना पड़ता है ।। १३ ।।

नित्यमेव सुखं स्वर्गे सुखं दुःखमिहोभयम् ।
नरके दुःखमेवाहुः सुखं तत्परमं पदम् ।। १४ ।।

स्वर्गमें सदा सुख ही होता है। इस मर्त्यलोकमें सुख और दुःख दोनों होते हैं। नरकमें केवल दुःख-ही-दुःख बताया गया है। वास्तविक सुख तो वह परमपदस्वरूप परब्रह्म परमात्मा ही है ।। १४ ।।

पृथिवी सर्वभूतानां जनित्री तद्विधाः स्त्रियः ।
पुमान् प्रजापतिस्तत्र शुक्रं तेजोमयं विदुः ।। १५ ।।

पृथिवी सम्पूर्ण भूतोंकी जननी है। संसारकी स्त्रियाँ भी पृथ्वीके समान ही संतानकी जननी होती हैं। पुरुष ही वहाँ प्रजापतिके समान है। पुरुषका जो वीर्य है, उसे तेजःस्वरूप समझा जाता है ।। १५ ।।

इत्येतल्लोकनिर्माणं ब्रह्मणा विहितं पुरा ।
प्रजाः समनुवर्तन्ते स्वैः स्वैः कर्मभिरावृताः ।। १६ ।।

पूर्वकालमें ब्रह्माजीने इस स्त्री-पुरुषस्वरूप जगत्की सृष्टि की थी। यहाँ समस्त प्रजा अपने-अपने कर्मोंसे आवृत होकर सुख-दुःखका अनुभव करती है ।। १६ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि भृगुभरद्वाजसंवादे
नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १९० ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें भृगु-भरद्वाजसंवादविषयक एक सौ नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १९० ।।

ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य आश्रमोंके धर्मका वर्णन

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एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः

ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य आश्रमोंके धर्मका वर्णन

भरद्वाज उवाच

दानस्य किं फलं प्राहुर्धर्मस्य चरितस्य च ।
तपसश्च सुतप्तस्य स्वाध्यायस्य हुतस्य वा ॥ १ ॥
**भरद्वाजने पूछा—**ब्रह्मन्! आचरणमें लाये हुए दानरूप धर्मका, भलीभाँति की हुई तपस्याका तथा स्वाध्याय और अग्निहोत्रका क्या फल बताया गया है? ॥ १ ॥

भृगुरुवाच

हुतेन शाम्यते पापं स्वाध्यायैः शान्तिरुत्तमा ।
दानेन भोगानित्याहुस्तपसा स्वर्गमाप्नुयात् ॥ २ ॥
**भृगुजीने कहा—**मुने! अग्निहोत्रसे पापका निवारण किया जाता है, स्वाध्यायसे उत्तम शान्ति मिलती है, दानसे भोगोंकी प्राप्ति बतायी गयी है और तपस्यासे मनुष्य स्वर्गलोक प्राप्त कर लेता है ॥ २ ॥

दानं तु द्विविधं प्राहुः परत्रार्थमिहैव च ।
सद्द्भ्यो यद् दीयते किंचित् तत्परत्रोपतिष्ठते ॥ ३ ॥
असद्द्भ्यो दीयते यत्तु तद् दानमिह भुज्यते ।
यादृशं दीयते दानं तादृशं फलमश्नुते ॥ ४ ॥
दान दो प्रकारका बताया जाता है—एक परलोकके लिये है और दूसरा इहलोकके लिये। सत्पुरुषोंको जो कुछ दिया जाता है, वह दान परलोकमें अपना फल देनेके लिये उपस्थित होता है और असत्पुरुषोंको जो दान दिया जाता है, उसका फल यहीं भोगा जाता है। जैसा दान दिया जाता है, वैसा ही उसका फल भी भोगनेमें आता है ॥ ३-४ ॥

भरद्वाज उवाच

किं कस्य धर्माचरणं किं वा धर्मस्य लक्षणम् ।
धर्मः कतिविधो वापि तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ ५ ॥
**भरद्वाजने पूछा—**ब्रह्मन्! किसका धर्माचरण कैसा होता है अथवा धर्मका लक्षण क्या है? या धर्मके कितने भेद हैं? यह सब आप मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ ५ ॥

भृगुरुवाच

स्वधर्माचरणे युक्ता ये भवन्ति मनीषिणः ।
तेषां स्वर्गफलावाप्तिर्योऽन्यथा स विमुह्यते ॥ ६ ॥

**भृगुजीने कहा—**मुने! जो मनीषी पुरुष अपने वर्णाश्रमोचित धर्मके आचरणमें सावधानीके साथ लगे रहते हैं, उन्हें स्वर्गरूपी फलकी प्राप्ति होती है। जो इसके विपरीत अधर्मका आचरण करता है, वह मोहके वशीभूत होता है* ॥ ६ ॥

भरद्वाज उवाच

यदेतच्चातुराश्रम्यं ब्रह्मर्षिविहितं पुरा ।
तेषां स्वे स्वे समाचारास्तान् मे वक्तुमिहार्हसि ॥ ७ ॥
**भरद्वाज ऋषिने पूछा—**भगवन्! ब्रह्मर्षियोंने पूर्वकालमें जो चार आश्रमोंका विभाग किया है, उनके अपने-अपने धर्म क्या हैं? उन्हें बतानेकी कृपा कीजिये ॥ ७ ॥

भृगुरुवाच

पूर्वमेव भगवता ब्रह्मणा लोकहितमनुतिष्ठता धर्मसंरक्षणार्थमाश्रमाश्चत्वारोऽभिनिर्दिष्टाः । तत्र गुरुकुलवासमेव प्रथममाश्रममुदाहरन्ति । सम्यग् यत्र शौचसंस्कारनियमव्रतविनियतात्मा उभे संध्ये भास्कराग्निदैवतान्युपस्थाय विहाय तन्द्र्यालस्ये गुरोरभिवादनवेदाभ्यासश्रवणपवित्रीकृतान्तरात्मा त्रिषवणमुपस्पृश्य ब्रह्मचर्याग्निपरिचरणगुरुशुश्रूषानि-त्यभिक्षाभैक्ष्यादि सर्वनिवेदितान्तरात्मा गुरुवचननि-र्देशानुष्ठानाप्रतिकूलो गुरुप्रसादलब्धस्वाध्यायतत्परः स्यात् ॥ ८ ॥
**भृगुजीने कहा—**मुने! जगत्‌का कल्याण करनेवाले भगवान्‌ ब्रह्माने पूर्वकालमें ही धर्मकी रक्षाके लिये चार आश्रमोंका निर्देश किया था। उनमेंसे ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक गुरुकुलवासको ही पहला आश्रम कहते हैं। उसमें रहनेवाले ब्रह्मचारीको बाहर-भीतरकी शुद्धि, वैदिक संस्कार तथा व्रत-नियमोंका पालन करते हुए अपने मनको वशमें रखना चाहिये। सुबह और शाम दोनों संध्याओंके समय संध्योपासना, सूर्योपस्थान और अग्निहोत्रके द्वारा अग्निदेवकी आराधना करनी चाहिये। तन्द्रा और आलस्यको त्यागकर प्रतिदिन गुरुको प्रणाम करे और वेदोंके अभ्यास तथा श्रवणसे अपनी अन्तरात्माको पवित्र करे। सबेरे, शाम और दोपहर तीनों समय स्नान करे। ब्रह्मचर्यका पालन, अग्निकी उपासना और गुरुकी सेवा करे। प्रतिदिन भिक्षा माँगकर लाये। भिक्षामें जो कुछ प्राप्त हो, वह सब गुरुको अर्पण कर दे। अपनी अन्तरात्माको भी गुरुके चरणोंमें निछावर कर दे। गुरुजी जो कुछ कहें जिसके लिये संकेत करें और जिस कार्यके निमित्त स्पष्ट शब्दोंमें आज्ञा दें, उसके विपरीत आचरण न करे। गुरुके कृपाप्रसादसे मिले हुए स्वाध्यायमें तत्पर होवे ॥ ८ ॥

भवति चात्र श्लोकः—
गुरुं यस्तु समाराध्य द्विजो वेदमवाप्नुयात् ।
तस्य स्वर्गफलावाप्तिः सिध्यते चास्य मानसमिति ॥ ९ ॥
इस विषयमें यह श्लोक है—

जो द्विज गुरुकी आराधना करके वेदाध्ययन करता है, उसे स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है

और उसका मानसिक संकल्प सिद्ध होता है ।। ९ ।।

गार्हस्थ्यं खलु द्वितीयमाश्रमं वदन्ति । तस्य समुदाचारलक्षणं

सर्वमनुव्याख्यास्यामः । समावृत्तानां सदाचाराणां सहधर्मचर्यफलार्थिनां गृहाश्रमो

विधीयते । धर्मार्थकामावाप्तिर्ह्यत्र त्रिवर्गसाधनमपेक्ष्यागर्हितेन कर्मणा धनान्यादाय

स्वाध्यायोपलब्धप्रकर्षेण वा ब्रह्मर्षिनिर्मितेन वा अद्रिसारगतेन वा ।

हव्यकव्यनियमाभ्यासदैवत-प्रसादोपलब्धेन वा धनेन गृहस्थो गार्हस्थ्यं वर्तयेत् ।

तद्धि सर्वाश्रमाणां मूलमुदाहरन्ति । गुरुकुलनिवासिनः परिव्राजका ये चान्ये

संकल्पितव्रतनियम-धर्मानुष्ठायिनस्तेषामप्यत एव भिक्षाबलिसंविभागाः

प्रवर्तन्ते ।। १० ।।

गार्हस्थ्यको दूसरा आश्रम कहते हैं। अब हम उसमें पालन करने योग्य समस्त उत्तम

आचरणोंकी व्याख्या करेंगे। जो सदाचारका पालन करनेवाले ब्रह्मचारी विद्या पढ़कर

गुरुकुलसे स्नातक होकर लौटते हैं, उन्हें यदि सहधर्मिणीके साथ रहकर धर्माचरण करने

और उसका फल पानेकी इच्छा हो तो उनके लिये गृहस्थाश्रममें प्रवेश करनेकी विधि है।

इस आश्रममें धर्म, अर्थ और काम तीनोंकी प्राप्ति होती है; इसलिये त्रिवर्गसाधनकी इच्छा

रखकर गृहस्थको उत्तम कर्मके द्वारा धन संग्रह करना चाहिये, अर्थात् वह स्वाध्यायसे प्राप्त

हुई विशिष्ट योग्यतासे, ब्रह्मर्षियोंद्वारा धर्मशास्त्रोंमें निश्चित किये हुए मार्गसे अथवा पर्वतसे

उपलब्ध हुए उसके सारभूत मणि रत्न, दिव्यौषधि एवं स्वर्ण आदिसे धनका संचय करे।

अथवा हव्य (यज्ञ), कव्य (श्राद्ध), नियम, वेदाभ्यास तथा देवताओंकी प्रसन्नतासे प्राप्त

धनके द्वारा गृहस्थ पुरुष अपनी गृहस्थीका निर्वाह करे; क्योंकि गृहस्थ आश्रमको सब

आश्रमोंका मूल कहते हैं। गुरुकुलमें निवास करनेवाले ब्रह्मचारी, वनमें रहकर संकल्पके

अनुसार व्रत, नियम तथा धर्मोंका पालन करनेवाले अन्यान्य वानप्रस्थ एवं सब कुछ

त्यागकर सर्वत्र विचरनेवाले संन्यासी भी इस गृहस्थाश्रमसे ही भिक्षा, भेंट, उपहार तथा दान

आदि पाकर अपने-अपने धर्मके पालनमें प्रवृत्त होते हैं ।। १० ।।

वानप्रस्थानां च द्रव्योपस्कार इति प्रायशः खल्वेते साधवः साधुपथ्यौदनाः

स्वाध्यायप्रसङ्गिन-स्तीर्थाभिगमनदेशदर्शनार्थं पृथिवीं पर्यटन्ति । तेषां

प्रत्युत्थानाभिगमनाभिवादनानसूयवाक्प्रदानसुखश-

क्त्यासनसुखशयनाभ्यवहारसत्क्रिया चेति ।। ११ ।।

वानप्रस्थोंके लिये धनका संग्रह करना निषिद्ध है। ये श्रेष्ठ लोग प्रायः शुद्ध एवं हितकर

अन्नमात्रके इच्छुक होकर स्वाध्याय, तीर्थयात्रा एवं देश-दर्शनके निमित्त सारी पृथ्वीपर

घूमते-फिरते हैं। ये घरपर पधारें तो उठकर, आगे बढ़कर इनका स्वागत करे। इनके चरणोंमें

मस्तक झुकावे, दोषदृष्टि न रखकर उनसे उत्तम वचन बोले। यथाशक्ति सुखद आसन दे,

सुखद शय्यापर उन्हें सुलावे और उत्तम भोजन करावे। इस प्रकार उनका पूर्ण सत्कार करे। यही उन श्रेष्ठ पुरुषके प्रति गृहस्थका कर्तव्य है ॥ ११ ॥

भवन्ति चात्र श्लोकाः— अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात् प्रतिनिवर्तते । स दत्त्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति ॥ १२ ॥ इस विषयमें ये श्लोक प्रसिद्ध हैं— जिस गृहस्थके दरवाजेसे कोई अतिथि भिक्षा न पानेके कारण निराश होकर लौट जाता है, वह उस गृहस्थको अपना पाप दे उसका पुण्य लेकर चला जाता है ॥

अपि चात्र यज्ञक्रियाभिर्देवताः प्रीयन्ते । निवापेन पितरो विद्याभ्यासश्रवणधारणेन ऋषयः । अपत्योत्पादनेन प्रजापतिरिति ॥ १३ ॥ इसके सिवा गृहस्थाश्रममें रहकर यज्ञ करनेसे देवता, श्राद्ध-तर्पण करनेसे पितर, वेद-शास्त्रोंके श्रवण, अभ्यास और धारणसे ऋषि तथा संतानोत्पादनसे प्रजापति प्रसन्न होते हैं ॥ १३ ॥

श्लोकौ चात्र भवतः— वात्सल्यात्सर्वभूतेभ्यो वाच्याः श्रोत्रसुखा गिरः । परितापोपघातश्च पारुष्यं चात्र गर्हितम् ॥ १४ ॥ इस विषयमें ये दो श्लोक प्रसिद्ध हैं— वाणी ऐसी बोलनी चाहिये, जिसमें सब प्राणियोंके प्रति स्नेह भरा हो तथा जो सुनते समय कानोंको सुखद जान पड़े। दूसरोंको पीड़ा देना, मारना और कटुवचन सुनाना—ये सब निन्दित कार्य हैं ॥ १४ ॥

अवज्ञानमहंकारो दम्भश्चैव विगर्हितः । अहिंसा सत्यमक्रोधः सर्वाश्रमगतं तपः ॥ १५ ॥ किसीका अनादर करना, अहंकार दिखाना और ढोंग करना—इन दुर्गुणोंकी भी विशेष निन्दा की गयी है। किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना, सत्य बोलना और मनमें क्रोध न आने देना—यह सभी आश्रमवालोंके लिये उपयोगी तप है ॥ १५ ॥

अपि चात्र माल्याभरणवस्त्राभ्यङ्गनित्योपभोग-नृत्यगीतवादित्रश्रुतिसुखनयनाभिरामदर्शनानां प्राप्तिर्भक्ष्यभोज्यलेह्यपेयचोष्याणामभ्यवहार्याणां विविधाना-मुपभोगः । स्वविहारसंतोषः कामसुखा-वाप्तिरिति ॥ १६ ॥ इसके सिवा इस गृहस्थ-आश्रममें फूलोंकी माला, नाना प्रकारके आभूषण, वस्त्र, अंगराग (तेल-उबटन), नित्य उपभोगकी वस्तु, नृत्य, गीत, वाद्य, श्रवणसुखद शब्द और नयनाभिराम रूपके दर्शनकी भी प्राप्ति होती है। भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, पेय और चोष्यरूप

नानाप्रकारके भोजनसम्बन्धी पदार्थ खाने-पीनेको भी मिलते हैं। अपने उद्यानमें घूमने-फिरनेका आनन्द प्राप्त होता है और कामसुखकी भी उपलब्धि होती है ॥ १६ ॥

त्रिवर्गगुणनिर्वृत्तिर्यस्य नित्यं गृहाश्रमे ।
स सुखान्यनुभूयेह शिष्टानां गतिमाप्नुयात् ॥ १७ ॥
जिस पुरुषको गृहस्थाश्रममें सदा धर्म, अर्थ और कामके गुणोंकी सिद्धि होती रहती है, वह इस लोकमें सुखका अनुभव करके अन्तमें शिष्ट पुरुषोंकी गतिको प्राप्त कर लेता है ॥ १७ ॥

उञ्छवृत्तिर्गृहस्थो यः स्वधर्माचरणे रतः ।
त्यक्तकामसुखारम्भः स्वर्गस्तस्य न दुर्लभः ॥ १८ ॥
जो गृहस्थ ब्राह्मण अपने धर्मके आचरणमें तत्पर हो उञ्छवृत्तिसे (खेत या बाजारमें बिखरे हुए अनाजके एक-एक दानेको बीनकर) जीविका चलाता है तथा काम-सुखका परित्याग कर देता है, उसके लिये स्वर्ग कोई दुर्लभ वस्तु नहीं है ॥ १८ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि भृगुभरद्वाजसंवादे
एकनवतत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें भृगु-भरद्वाजसंवादविषयक एक सौ इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९१ ॥


* इस श्लोकमें पूर्वोक्त तीनों प्रश्नोंका एक साथ ही सामान्य उत्तर दे दिया गया है। जो जिस वर्ण अथवा आश्रमका है, उसका धर्माचरण भी वैसा ही है। धर्मका लक्षण है—स्वर्गप्राप्ति करानेवाला वर्णाश्रमोचित आचार। वर्ण और आश्रमके जितने भेद हैं, उतने ही उनके धर्मके भी हैं।