महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 127, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ें‘राजन्! मोक्षकी प्राप्ति संशयास्पद है और प्राणी प्रारब्धके अधीन हैं। ऐसी दशामें उन अर्थार्थी सेवकोंको यदि आप विफल-मनोरथ करते हैं तो पता नहीं किस लोकमें जायँगे? ।। १४ ।। नैव तेऽस्ति परो लोको नापरः पापकर्मणः । धर्म्यान् दारान् परित्यज्य यस्त्वमिच्छसि जीवितुम् ।। १५ ।। ‘आप अपनी धर्मपत्नीका परित्याग करके जो अकेला जीवन बिताना चाहते हैं, इससे आप पापकर्मा बन गये हैं; अतः आपके लिये न यह लोक सुखद होगा, न परलोक ।। १५ ।। स्रजो गन्धानलंकारान् वासांसि विविधानि च । किमर्थमभिसंत्यज्य परिव्रजसि निष्क्रियः ।। १६ ।। ‘बताइये तो सही, इन सुन्दर-सुन्दर मालाओं, सुगन्धित पदार्थों, आभूषणों और भाँति-भाँतिके वस्त्रोंको छोड़कर किसलिये कर्महीन होकर घरका परित्याग कर रहे हैं? ।। १६ ।। निपानं सर्वभूतानां भूत्वा त्वं पावनं महत् । आढ्यो वनस्पतिर्भूत्वा सोऽन्यांस्त्वं पर्युपाससे ।। १७ ।। ‘आप सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये पवित्र एवं विशाल प्याऊके समान थे—सभी आपके पास अपनी प्यास बुझाने आते थे। आप फलोंसे भरे हुए वृक्षके समान थे—कितने ही प्राणियोंकी भूख मिटाते थे, परंतु वे ही आप अब (भूख-प्यास मिटानेके लिये) दूसरोंका मुँह जोह रहे हैं ।। खादन्ति हस्तिनं न्यासैः क्रव्यादा बहवोऽप्युत । बहवः कृमयश्चैव किं पुनस्त्वामनर्थकम् ।। १८ ।। ‘यदि हाथी भी सारी चेष्टा छोड़कर एक जगह पड़ जाय तो मांसभक्षी जीव-जन्तु और कीड़े धीरे-धीरे उसे खा जाते हैं। फिर सब पुरुषार्थोंसे शून्य आप-जैसे मनुष्योंकी तो बात ही क्या है? ।। १८ ।। य इमां कुण्डिकां भिन्द्यात् त्रिविष्टब्धं च यो हरेत् । वासश्चापि हरेत् तस्मिन् कथं ते मानसं भवेत् ।। १९ ।। ‘यदि आपकी कोई यह कुण्डी फोड़ दे, त्रिदण्ड उठा ले जाय और ये वस्त्र भी चुरा ले जाय तो उस समय आपके मनकी कैसी अवस्था होगी? ।। १९ ।। यस्त्वयं सर्वमुत्सृज्य धानामुष्टेरनुग्रहः । यदानेन समं सर्वं किमिदं ह्यवसीयसे ।। २० ।। ‘यदि सब कुछ छोड़कर भी आप मुट्ठीभर जौके लिये दूसरोंकी कृपा चाहते हैं तो राज्य आदि अन्य सब वस्तुएँ भी तो इसीके समान हैं। फिर उस राज्यके त्यागकी क्या विशेषता रही? ।। २० ।। धानामुष्टेरिहार्थश्चेत् प्रतिज्ञा ते विनश्यति ।