महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1387, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकीर्णमेष भारं हि यद्वद् धार्येत दस्युभिः ।
प्रतिलोमां दिशं बुद्ध्वा संसारमबुधास्तथा ॥ १४ ॥
जैसे चोर या लुटेरे किसीकी भेड़को मारकर उसे कंधेपर उठाये हुए जबतक भागते हैं तबतक उन्हें सारी दिशाओंमें पकड़े जानेका भय बना रहता है; और जब मार्गको प्रतिकूल समझकर उस भेड़के बोझको अपने कंधेसे उतार फेंकते हैं तब अपनी अभीष्ट दिशाको सुखपूर्वक चले जाते हैं। उसी प्रकार अज्ञानी मनुष्य जबतक सांसारिक कर्मरूप बोझको ढोते हैं तबतक उन्हें सर्वत्र भय बना रहता है; और जब उसे त्याग देते हैं, तब शान्तिके भागी हो जाते हैं ॥ १४ ॥
तमेव च यथा दस्युः क्षिप्त्वा गच्छेच्छिवां दिशम् ।
तथा रजस्तमः कर्माण्युत्सृज्य प्राप्नुयाच्छुभम् ॥ १५ ॥
जैसे चोर या डाकू जब उस चोरीके मालका बोझ उतार फेंकता है तब जहाँ उसे सुख मिलनेकी आशा होती है, उस दिशामें अनायास चला जाता है। उसी प्रकार मनुष्य राजस और तामस कर्मोंको त्यागकर शुभ गति प्राप्त कर लेता है ॥ १५ ॥
निःसंदिग्धमनीहो वै मुक्तः सर्वपरिग्रहैः ।
विविक्तचारी लघ्वाशी तपस्वी नियतेन्द्रियः ॥ १६ ॥
ज्ञानदग्धपरिक्लेशः प्रयोगरतिरात्मवान् ।
निष्प्रचारेण मनसा परं तदधिगच्छति ॥ १७ ॥
जो सब प्रकारके संग्रहसे रहित, निरीह, एकान्त-वासी, अल्पाहारी, तपस्वी और जितेन्द्रिय है, जिसके सम्पूर्ण क्लेश ज्ञानाग्निसे दग्ध हो गये हैं; तथा जो योगानुष्ठानका प्रेमी और मनको वशमें रखनेवाला है, वह अपने निश्चल चित्तके द्वारा उस परब्रह्म परमात्माको निःसंदेह प्राप्त कर लेता है ॥ १६-१७ ॥
धृतिमानात्मवान् बुद्धिं निगृह्णीयादसंशयम् ।
मनो बुद्ध्या निगृह्णीयाद् विषयान्मनसाऽऽत्मनः ॥ १८ ॥
बुद्धिमान् एवं धीर पुरुषको चाहिये कि वह बुद्धिको निश्चय ही अपने वशमें करे; फिर बुद्धिके द्वारा मनको और मनके द्वारा अपनी इन्द्रियोंको विषयोंकी ओरसे रोककर अपने अधीन करे ॥ १८ ॥
निगृहीतेन्द्रियस्यास्य कुर्वाणस्य मनो वशे ।
देवतास्तत् प्रकाशन्ते हृष्टा यान्ति तमीश्वरम् ॥ १९ ॥
इस प्रकार जिसने इन्द्रियोंको वशमें करके मनको अपने अधीन कर लिया है, उस अवस्थामें उसकी इन्द्रियोंके अधिष्ठातृदेवता प्रसन्नतासे प्रकाशित होने लगते हैं; और ईश्वरकी ओर प्रवृत्त हो जाते हैं ॥ १९ ॥
ताभिः संयुक्तमनसो ब्रह्म तत् सम्प्रकाशते ।
शनैश्चोपगते सत्त्वे ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २० ॥